by on | 2026-07-06 19:45:56
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वाराणसी/गाजीपुर: जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और खाकी ही अपराधियों को 'क्लीन चिट' बांटने पर आमादा हो जाए, तो फिर इंसाफ की उम्मीद किससे की जाए? गाजीपुर से एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां सरकारी टेंडर में करोड़ों के फर्जीवाड़े को दबाने की कोशिश कर रहे दो दरोगाओं पर कानून का डंडा चला है। वाराणसी परिक्षेत्र के DIG वैभव कृष्ण ने एक बड़ी 'सर्जिकल स्ट्राइक' करते हुए दोनों उपनिरीक्षकों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। इस बड़ी कार्रवाई से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
क्या है पूरा मामला? (खेल GeM पोर्टल का, जालसाजी करोड़ों की!)
मामला पिछले साल 25 फरवरी 2025 का है, जब गाजीपुर के कोतवाली थाने में एक मुकदमा दर्ज हुआ था। आरोप था कि 'गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM)' पोर्टल के जरिए तकनीकी अनुदेशकों की नियुक्ति का टेंडर निकाला गया था। इस सरकारी टेंडर को हथियाने के लिए 7 निजी फर्मों ने मिलकर एक बड़ा खेल खेला। इन कंपनियों ने फर्जी वित्तीय दस्तावेज—यानी फर्जी डीडी (DD), एफडीआर (FDR) और ईएमडी (EMD) तैयार किए और सरकार की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की।
जांच के नाम पर 'लीपापोती', दरोगाओं ने रची 'फाइनल रिपोर्ट' की साजिश!
इस हाई-प्रोफाइल मामले की जांच का जिम्मा कोतवाली थाने के दो दरोगाओं—रोहित कुमार और जितेंद्र कुमार उपाध्याय के पास था। लेकिन इन विवेचकों ने ईमानदारी से जांच करने के बजाय मामले को रफा-दफा करने का शॉर्टकट ढूंढ लिया।
DIG वैभव कृष्ण की समीक्षा में जो खुलासा हुआ, वो बेहद चौंकाने वाला था:
सबूतों को किया नजरअंदाज: अपराध के पुख्ता संकेत होने के बावजूद दोनों दरोगाओं ने गंभीर तथ्यों की जांच ही नहीं की।
दागियों को बचाने का प्रयास: बिना किसी ठोस आधार के, सातों संदिग्ध और जालसाज फर्मों को क्लीन चिट देकर जांच के दायरे से बाहर रखने की पूरी सेटिंग कर ली गई थी।
जल्दबाजी में फाइल बंद करने की फिराक: मामले में सच सामने लाने के बजाय, आनन-फानन में फाइनल रिपोर्ट (FR) लगाकर केस को बंद करने की साजिश रची जा रही थी।
"अपराधियों से साठगांठ और संवेदनशील मामलों में लीपापोती किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगी। खाकी की आड़ में खेल करने वालों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति जारी रहेगी।"
— वैभव कृष्ण, डीआईजी (वाराणसी परिक्षेत्र)
अब आगे क्या? 30 दिन में खुलेगा सातों फर्मों का कच्चा चिट्ठा!
DIG के हंटर के बाद अब इस मामले की फाइलें फिर से खुल गई हैं। दोनों दोषी दरोगाओं को सस्पेंड लाइन हाजिर करने के साथ ही, मामले की निष्पक्ष जांच अब क्षेत्राधिकारी (नगर) को सौंप दी गई है। डीआईजी ने सख्त लहजे में आदेश दिया है कि अगले 30 दिनों के भीतर इस पूरे फर्जीवाड़े की परत-दर-परत जांच कर अंतिम रिपोर्ट पेश की जाए।
बेबाक टिप्पणी:
सवाल बड़ा है कि आखिर इन सातों रसूखदार फर्मों के पीछे किसका हाथ था, जिसके दबाव या लालच में आकर दो-दो दरोगा अपनी नौकरी दांव पर लगा बैठे? बहरहाल, डीआईजी वैभव कृष्ण की इस कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि महकमे में 'काली भेड़' बनकर घूम रहे पुलिसकर्मियों की अब खैर नहीं है।
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