by on | 2026-07-06 12:42:07
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मुंबई/अमृतसर ब्यूरो: भारतीय सिनेमा और ओटीटी (OTT) स्पेस से इस साल की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। मशहूर अभिनेता और सिंगर दिलजीत दोसांझ (Diljit Dosanjh) की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'सतलुज' (पूर्व नाम: 'पंजाब 95') को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) पर रिलीज होने के महज दो दिन के भीतर ही भारत में अचानक 'हटा' (Ban/Pull Down) दिया गया है।
यह फिल्म 3 जुलाई 2026 को रिलीज हुई थी और 5 जुलाई 2026 की शाम को इसे प्लेटफॉर्म से गायब कर दिया गया। इस फैसले के बाद फिल्म के हीरो दिलजीत दोसांझ और निर्देशक हनी त्रेहन के बयानों ने देश के सिनेमाई गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
फिल्म को अचानक हटाए जाने के बाद ज़ी5 ने अपने आधिकारिक 'एक्स' (ट्विटर) हैंडल पर रविवार रात 8:30 बजे एक गोलमोल बयान जारी किया:
ZEE5 का आधिकारिक बयान:
"'सतलुज' भले ही थम गई हो, लेकिन उसने जो चर्चा छेड़ी था, वो अब भी जारी है। रिलीज के बाद से फिल्म को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला है। हम 'सतलुज' के रचनात्मक नजरिए के साथ मजबूती से खड़े हैं। लेकिन अगले आदेश तक 'सतलुज' भारत में उपलब्ध नहीं होगी। हम इसे जल्द से जल्द वापस लाने के सभी विकल्पों पर काम कर रहे हैं।"
इस बैननुमा कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए फिल्म के मुख्य अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर लिखा:
"अब ये फिल्म रुकने वाली नहीं है। खालड़ा साब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता।"
यह फिल्म पिछले दो सालों से सेंसरशिप और विवादों के चक्रव्यूह में फंसी हुई थी। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने पूर्व में दिए इंटरव्यू में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए थे:
21 से बढ़कर हुए 120 कट्स: हनी त्रेहन के मुताबिक, शुरुआत में सेंसर बोर्ड ने फिल्म में 21 कट लगाने को कहा था। लेकिन बाद में राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों का हवाला देते हुए कट्स की संख्या 120 से अधिक कर दी गई, जिसका कोई तार्किक कारण नहीं बताया गया।
नाम बदलने का दबाव: निर्देशक ने खुलासा किया था कि सेंसर बोर्ड की तरफ से यह तक मांग की गई थी कि फिल्म से मुख्य किरदार यानी 'जसवंत सिंह खालड़ा' का नाम ही पूरी तरह हटा दिया जाए।
मूल स्वरूप से समझौता नहीं: ओटीटी रिलीज के वक्त हनी त्रेहन ने राहत की सांस लेते हुए कहा था कि यह फिल्म बिना किसी कांट-छांट के अपने मूल स्वरूप में रिलीज हो रही है, लेकिन रिलीज के 48 घंटे के भीतर ही इस पर डिजिटल ताला लगा दिया गया।
यह फिल्म किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास के सबसे चर्चित और संवेदनशील मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा (Jaswant Singh Khalra) के जीवन और उनकी संदेहास्पद मौत पर आधारित है।
अज्ञात शवों का खुलासा: 1980 और 1990 के दशक में जब पंजाब चरमपंथ और पुलिस के बीच खूनी संघर्ष से जूझ रहा था, तब शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग के महासचिव जसवंत सिंह खालड़ा ने एक बड़ा खुलासा किया था। उन्होंने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के श्मशान घाटों से जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच जलाए गए हजारों अज्ञात और लावारिस शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था।
पुलिस पर अवैध हत्याओं का आरोप: खालड़ा का दावा था कि ये लावारिस शव असल में उन सिखों के थे, जिन्हें पुलिस ने अवैध हिरासत में लेकर कथित फर्जी मुठभेड़ों (Fake Encounters) में मार डाला था।
अमृतसर से दिन-दहाड़े अपहरण और हत्या: सीबीआई (CBI) की अदालती रिपोर्ट के मुताबिक, खालड़ा के इन खुलासों से स्थानीय पुलिस नाराज थी। इसी साजिश के तहत 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से पुलिस अधिकारियों ने दिन-दहाड़े उनका अपहरण कर लिया। बाद में अवैध हिरासत में उनकी हत्या कर दी गई और शव को हरिके क्षेत्र की एक नहर में फेंक दिया गया।
फिल्म 'सतलुज' (पंजाब 95) का ओटीटी प्लेटफॉर्म से इस तरह अचानक हटाया जाना भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी (Freedom of Speech) पर एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और प्रशासनिक प्रहार है। जब फिल्म थिएटर्स की बजाय सीधे ओटीटी पर बिना किसी कट के रिलीज हो चुकी थी, तब आखिर वो कौन सी अदृश्य 'सुपर-पावर' या राजनीतिक दबाव था, जिसके सामने ज़ी5 को घुटने टेकने पड़े और फिल्म को हटाना पड़ा?
'बेबाक24' का मानना है कि जसवंत सिंह खालड़ा का नाम इतिहास के पन्नों से मिटाने की कोशिशें आज भी जारी हैं। 90 के दशक में पंजाब पुलिस की ज्यादतियों और मानवाधिकारों के हनन का जो काला सच खालड़ा ने दुनिया के सामने रखा था, वह आज भी सत्ता प्रतिष्ठानों को डराता है। दिलजीत दोसांझ जैसे ग्लोबल स्टार का इस फिल्म को अपनी आवाज देना यह साबित करता है कि यह सिनेमा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि पंजाब के घावों पर सच का मरहम लगाने के लिए बना था। सेंसर बोर्ड का 120 कट्स मांगना और फिर जसवंत सिंह खालड़ा का नाम ही फिल्म से गायब करने की जिद यह दर्शाती है कि प्रशासनिक व्यवस्था इतिहास के कड़वे सच का सामना करने की हिम्मत नहीं रखती। फिल्म को रोककर सरकारें रीलों को तो दबा सकती हैं, लेकिन डिजिटल युग में विचारों और खालड़ा की विरासत को दबाना नामुमकिन है।
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