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अर्श से फ़र्श तक: जो कूटनीतिक लक्ष्य तुर्की-पाकिस्तान के लिए 'सपना' है, वो भारत और अंकारा के बीच पहले से है हक़ीक़त

by on | 2026-07-06 12:32:15

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अर्श से फ़र्श तक: जो कूटनीतिक लक्ष्य तुर्की-पाकिस्तान के लिए 'सपना' है, वो भारत और अंकारा के बीच पहले से है हक़ीक़त

नल डेस्क (बेबाक24): मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इन दिनों 'इस्लामाबाद-इस्तांबुल' कूटनीतिक धुरी एक बार फिर चर्चा में है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को तुर्की के सबसे अहम शहर इस्तांबुल पहुंचे, जहाँ उन्होंने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। दोनों नेताओं ने एक बार फिर पुराने राग को अलापते हुए द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक ले जाने की बड़ी-बड़ी बातें कहीं।

लेकिन कागज़ी भाईचारे और रणनीतिक साझेदारी की इस चमकीली बयानबाज़ी के पीछे का कड़वा सच यह है कि अर्दोआन पाकिस्तान के साथ जो आर्थिक लक्ष्य लंबे समय से हासिल करना चाहते हैं, भारत और तुर्की के बीच वह बहुत पहले से ही हक़ीक़त का रूप ले चुका है।

1. आंकड़ों का खेल: पाकिस्तान से 'भाईचारा', भारत से 'व्यापार'

तुर्की और पाकिस्तान के बीच 'सनातनी दोस्ती' और कश्मीर के मुद्दे पर साझी बयानबाज़ी का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन जब बात देश की तिजोरी और व्यापार की आती है, तो तुर्की का झुकाव भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था की तरफ साफ़ दिखता है।

व्यापारिक पैमानातुर्की - पाकिस्तान संबंधतुर्की - भारत संबंध
वर्तमान द्विपक्षीय व्यापारमुश्किल से 1 अरब डॉलर (अस्थिर और सीमित)सालाना लगभग 10 अरब डॉलर (2023 में $13.8 अरब का रिकॉर्ड)
भविष्य का कूटनीतिक लक्ष्य5 अरब डॉलर तक पहुंचाना (लंबे समय से केवल दावा)कुल व्यापार को 20 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य
रणनीतिक स्थानपाकिस्तान केवल आयात पर निर्भर हैभारत तुर्की के शीर्ष 25 निर्यात बाज़ारों में शामिल है
सरकारी प्राथमिकताकेवल राजनीतिक व रक्षा (ड्रोन) सहयोग तक सीमिततुर्की की 'टारगेटेड डिस्टेंट कंट्रीज़ स्ट्रैटिजी' के तहत 18 प्रमुख देशों में शामिल

नोट: व्यापार का वॉल्यूम ज़्यादा होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दोनों देशों में भरोसा भी ज़्यादा है। उदाहरण के लिए, चीन के साथ भारत का व्यापार 150 अरब डॉलर पार कर चुका है, लेकिन सीमा पर तनाव और कूटनीतिक अविश्वास जगज़ाहिर है। यही बात भारत-तुर्की संबंधों पर भी लागू होती है।

2. इतिहास के पन्नों से: शीत युद्ध की कड़वाहट और अविश्वास का सफर

भारत और तुर्की के बीच राजनयिक संबंध साल 1948 में ही स्थापित हो गए थे, लेकिन अगले कई दशकों तक दोनों देशों के बीच की दूरी कम नहीं हो सकी। इसके पीछे दो मुख्य कूटनीतिक कारण थे:

  • शीत युद्ध की गुटबाज़ी: साल 1949 में जब 'नेटो' (NATO) का गठन हुआ, तो तुर्की अमेरिकी खेमे में शामिल हो गया, जिसे सोवियत संघ विरोधी माना जाता था। इसके बाद 1955 में तुर्की, पाकिस्तान, इराक, ब्रिटेन और ईरान ने मिलकर नेटो की तर्ज़ पर सोवियत संघ के खिलाफ 'बग़दाद पैक्ट' (बाद में सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन - CENTO) किया। दूसरी तरफ, भारत गुटनिरपेक्षता (Non-Aligned Movement) की वकालत करते हुए भी सोवियत संघ के करीब था।

  • कश्मीर पर पाकिस्तान-परस्त रुख: तुर्की ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के कश्मीर एजेंडे का समर्थन किया। साल 2020 में भी पाकिस्तानी संसद में अर्दोआन ने कहा था कि "कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए है, उतना ही तुर्की के लिए भी है।"

जब रिश्तों में आई थी सुधार की बहार

  • 1986 & 1988: शीत युद्ध के कमज़ोर पड़ने पर तुर्की के उदारवादी राष्ट्रपति तुरगुत ओज़ाल भारत आए, जिसके जवाब में 1988 में तत्कालीन भारतीय पीएम राजीव गांधी ने तुर्की का दौरा किया।

  • बुलांत एजेवेत (एकमात्र 'भारत-समर्थक' पीएम): अप्रैल 2000 में तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री बुलांत एजेवेत भारत दौरे पर आए। उन्होंने पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के तख़्तापलट को मंज़ूरी नहीं दी और पाकिस्तान का निमंत्रण तक ठुकरा दिया। सबसे अहम बात यह थी कि उन्होंने कश्मीर पर तुर्की के पारंपरिक स्टैंड (संयुक्त राष्ट्र की निगरानी) को बदलते हुए इसे 'द्विपक्षीय समाधान' तलाशने की वकालत की थी।

  • 2003: भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तुर्की का दौरा किया, जिससे दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच संपर्क बढ़ा।

3. इस्तांबुल की ताजा प्रेस कॉन्फ़्रेंस: मिडिल ईस्ट कूटनीति और ड्रोन पॉलिटिक्स

ताजा बैठक में पाकिस्तान के पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने ईरान-अमेरिका के बीच हाल ही में हुए अंतरिम समझौते में पाकिस्तान और कतर की भूमिका की सराहना करने के लिए अर्दोआन का धन्यवाद किया। साथ ही उन्होंने कश्मीर पर तुर्की के 'अटल रुख' की तारीफ की, हालांकि इस बार अर्दोआन ने मंच पर कश्मीर के मुद्दे पर सीधे बोलने से परहेज किया

अर्दोआन का पूरा ध्यान इस समय दो चीज़ों पर केंद्रित था:

  • इसराइल पर निशाना: अर्दोआन ने कहा कि मौजूदा इसराइली सरकार लगातार युद्ध का रास्ता अपना रही है और वह ईरान-अमेरिका समझौते को पटरी से उतारना चाहती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इसराइल को इस क्षेत्र को बारूद में डुबोने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए।

  • रक्षा और ड्रोन सहयोग: पाकिस्तान इस समय तुर्की के अत्याधुनिक ड्रोन्स (जैसे बेयराकटार) में भारी दिलचस्पी ले रहा है। तुर्की की कंपनी 'बेयकार' ने यह साफ़ कर दिया है कि वह भारत को कोई ड्रोन सप्लाई नहीं करेगी। तुर्की रक्षा क्षेत्र के ज़रिये पाकिस्तान की सैन्य ताकत बढ़ाकर अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है।

बेबाक24 टेक

इस्तांबुल की यह संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस कूटनीतिक रूप से 'दिल बहलाने के लिए ख़्याल अच्छा है' जैसी स्थिति को दर्शाती है। तुर्की और पाकिस्तान के बीच 'इस्लामिक ब्रदरहुड' और कश्मीरी आत्मनिर्णय की बातें केवल भाषणों और तालियों तक सीमित हैं। यथार्थवादी कूटनीति (Realpolitik) हमेशा भावनाओं से नहीं, बल्कि व्यापार और वित्तीय लाभ से चलती है। तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन भली-भांति जानते हैं कि कंगाली और कर्ज के दलदल में फंसे पाकिस्तान से वे ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और आईटी क्षेत्र में 5 अरब डॉलर का व्यापार अगले एक दशक में भी हासिल नहीं कर सकते।

'बेबाक24' का मानना है कि अर्दोआन का इस बार सार्वजनिक मंच पर कश्मीर मुद्दे पर सीधे बोलने से बचना यह दिखाता है कि भारत की आर्थिक ताकत के सामने तुर्की अब अपने कड़े रुख को धीरे-धीरे नरम करने पर मजबूर हो रहा है। भारत के साथ तुर्की का व्यापार पहले से ही 10 अरब डॉलर के पार है, और तुर्की के कारोबारी कभी नहीं चाहेंगे कि कश्मीर पर अत्यधिक बयानबाज़ी के कारण वे भारत जैसे विशाल बाज़ार को खो दें। रही बात ड्रोन तकनीक की, तो तुर्की द्वारा भारत को ड्रोन न देना और पाकिस्तान को सैन्य रूप से मजबूत करना नई दिल्ली के लिए एक सुरक्षा चुनौती ज़रूर है, लेकिन भारत का अपना स्वदेशी ड्रोन प्रोग्राम और पश्चिमी देशों से रक्षा सौदे तुर्की की इस 'ड्रोन कूटनीति' का जवाब देने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। तुर्की को यह समझना होगा कि पाकिस्तान से कूटनीतिक वफ़ादारी अपनी जगह है, लेकिन आर्थिक महाशक्ति बनने का रास्ता नई दिल्ली को नज़रअंदाज़ करके नहीं जा सकता।



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