by admin@bebak24.com on | 2026-07-05 11:52:46
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सांस्कृतिक डेस्क (बेबाक24): छत्तीसगढ़ की लोक कला 'पंडवानी' को वैश्विक मंच पर एक अमिट पहचान देने वाली देश की महान लोक कलाकार और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन को लेकर रायपुर एम्स (AIIMS) प्रबंधन की ओर से बेहद महत्वपूर्ण और आधिकारिक चिकित्सा विवरण सामने आया है। बीबीसी संवाददाता विष्णुकांत तिवारी की रिपोर्ट के अनुसार, तीजन बाई पिछले काफी समय से पार्किंसंस सहित कई अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं।
एम्स रायपुर के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर (PRO) डॉ. लक्ष्मीनारायण चौधरी ने आधिकारिक तौर पर तीजन बाई के अंतिम क्षणों और उनकी बीमारी की पुष्टि करते हुए बताया:
27 मई से थीं भर्ती: डॉ. तीजन बाई की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें 27 मई 2026 को रायपुर एम्स में दाखिल कराया गया था, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा था।
पार्किंसंस से थीं पीड़ित: डॉ. चौधरी के मुताबिक, तीजन बाई पार्किंसंस (Parkinson's Disease) जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी सहित उम्र से संबंधित कई अन्य जटिल बीमारियों से पीड़ित थीं।
दिल का दौरा पड़ने से मौत: 4 और 5 जुलाई की दरम्यानी रात को तड़के 2:45 बजे उन्हें अचानक दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ा। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और रविवार सुबह 3:15 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली।
छत्तीसगढ़ के भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने बेहद कम उम्र में सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों को तोड़कर तंबूरा हाथ में उठा लिया था:
पहला मंच: उन्होंने मात्र 13 साल की उम्र में अपना पहला सार्वजनिक मंचन किया था।
महाभारत की जीवंत प्रस्तुति: अपनी कड़कड़ाती और बुलंद आवाज़, बेजोड़ अभिनय और अनूठी कापालिक शैली के जरिए मंच पर महाभारत के पात्रों (जैसे भीम, अर्जुन, द्रौपदी) को जीवंत करने की उनकी कला ने उन्हें दुनिया भर में अमर कर दिया।
सर्वोच्च नागरिक सम्मान: भारतीय लोक कला और छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाने के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया था।
एम्स रायपुर के पीआरओ डॉ. लक्ष्मीनारायण चौधरी द्वारा दी गई यह जानकारी यह साफ करती है कि तीजन बाई पिछले एक महीने से अधिक समय (27 मई से) से अस्पताल के बिस्तर पर जीवन और मौत की जंग लड़ रही थीं। पार्किंसंस जैसी बीमारी ने उनकी उस शारीरिक क्षमता और ऊर्जा को धीमा कर दिया था, जिसके लिए वह मंच पर जानी जाती थीं। लेकिन 70 वर्ष की आयु में उनका इस तरह जाना लोक संस्कृति के एक जीवंत अध्याय का बंद हो जाना है। 'बेबाक24' इस महान और निडर विदुषी को सादर नमन करता है, जिन्होंने आखिरी सांस तक पंडवानी को अपने सीने से लगाए रखा।
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