by on | 2026-06-28 12:12:08
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'गढ़ांचल' में फिर सजी महाभारत की बिसात, क्या पीयूष राय भेदेंगे माफिया का चक्रव्यूह?
सामने खड़ा है 'शिखंडी' रूपी छद्म राजनीतिक जाल, विरासत संभालने आगे आया नया सारथी
विशेष ब्यूरो
गाजीपुर/ वाराणसी। पूर्वांचल की सियासत का सबसे संवेदनशील और ऐतिहासिक केंद्र रहा मोहम्मदाबाद एक बार फिर भीषण राजनीतिक तपिश की चपेट में है। लेकिन इस बार चर्चा सिर्फ अतीत के जख्मों और पुराने खूनी संघर्षों की नहीं है, बल्कि देश की सत्ता के केंद्र दिल्ली (इंद्रप्रस्थ) से लेकर लखनऊ के गलियारों तक बिछ रही उस नई बिसात की है, जो गढ़ांचल की तकदीर तय करने वाली है। माफिया के खौफनाक दौर में अपनों को खोने वाली इस सियासी सरजमीं पर अब स्वर्गीय कृष्णानंद राय के एक नए उत्तराधिकारी की ताजपोशी की सुगबुगाहट ने उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चरम पर पहुंचा दिया है।
शराफत बनाम सियासत: न्याय की अधूरी आस
इतिहास गवाह है कि तत्कालीन भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की नृशंस हत्या के बाद उनके परिवार ने कभी कानून अपने हाथ में नहीं लिया और हमेशा मर्यादा व शराफत का रास्ता चुना। पूर्व विधायक अलका राय और उस वक्त स्कूल में पढ़ रहे उनके बच्चों ने अदालतों के चक्कर काटे। हालांकि, गवाहों के टूटने, सीबीआई जांच के भटकाव और सिस्टम की पेचीदगियों के कारण इंसाफ की डगर हमेशा कठिन बनी रही।
गढ़ांचल के प्रबुद्ध लोगों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि इसी शराफत और कानूनी उलझनों का फायदा उठाकर माफिया तंत्र सालों तक सत्ता के संरक्षण में फलता-फूलता रहा। कृष्णानंद राय समेत उस खूनी मंजर में मारे गए करीब 25 भाजपा नेताओं और ब्राह्मण समाज के कार्यकर्ताओं के परिवारों के सीने में आज भी इंसाफ न मिलने की कसक और टीस साफ महसूस की जा सकती है।
इनसेट : मोहरों के पीछे छिपे हैं 'शिखंडी'
क्षेत्र के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बेहद गर्म है कि इस बार माफिया और विरोधी ताकतें सीधे मैदान में आने के बजाय 'शिखंडी' रूपी छद्म मोहरों को आगे कर चुनावी बिसात सजा रही हैं। अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख परदे के पीछे से गोटियां चली जा रही हैं, लेकिन स्थानीय लोगों में अब यह साफ चर्चा है कि क्षेत्र की जागरूक जनता इस बार किसी झांसे में नहीं आने वाली और वह एकजुट होकर इस पूरे चक्रव्यूह को तार-तार कर देगी।
कंधे पर विरासत, सीने में न्याय की टीस: पीयूष राय का उभार
वक्त का पहिया घूमा है, और अब गढ़ांचल की इस दबी हुई चीख को मुकम्मल आवाज देने की जिम्मेदारी युवा नेता पीयूष राय के कंधों पर आ टिकी है। अपने पिता की गौरवशाली राजनीतिक विरासत और क्षेत्र की जनता के प्रति जवाबदेही को संभाल रहे पीयूष राय आज उन तमाम पीड़ित परिवारों की आखिरी उम्मीद बन चुके हैं, जो सालों से न्याय की आस में बैठे हैं।
स्थानीय राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि यदि पीयूष राय की राजनीतिक ताजपोशी होती है, तो यह सिर्फ एक पारंपरिक पद की लड़ाई नहीं होगी। यह स्वर्गीय कृष्णानंद राय के अधूरे संघर्ष को मुकाम तक पहुंचाने, माफियाराज के बचे-खुचे अवशेषों को खत्म करने और मोहम्मदाबाद के स्वाभिमान व गौरव को वापस लाने की जंग होगी।
दिल्ली से लखनऊ तक मची खलबली, बदलेंगे समीकरण
मोहम्मदाबाद के इस नए सियासी मोड़ ने देश की राजधानी दिल्ली से लेकर लखनऊ के शक्ति केंद्रों तक हलचल पैदा कर दी है। महाभारत के मैदान की तरह यहाँ भी आमने-सामने की जंग तय हो चुकी है। एक तरफ वो ताकतें हैं जो परदे के पीछे से अपने 'शिखंडियों' को आगे कर पुराने रसूख और खूनी साम्राज्य की बची हुई साख को बचाए रखना चाहती हैं, तो दूसरी तरफ कृष्णानंद राय का वह युवा उत्तराधिकारी है जो सीधे न्याय की हुंकार भर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो पीयूष राय का यह बढ़ता कदम और मोहम्मदाबाद का उनके पक्ष में उमड़ता जनसैलाब पूर्वांचल के आने वाले सभी चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से ध्वस्त और परिवर्तित करने का दम रखता है।
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