by on | 2026-06-27 23:56:55
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लखनऊ । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होते ही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के खेमे से बड़ी राजनीतिक हलचल की खबरें आ रही हैं। मायावती ने करीब 10 संभावित प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर और सांगठनिक फेरबदल के जरिए अपने इरादे साफ कर दिए हैं। लेकिन इस चुनावी तैयारियों के बीच दो बड़े सवाल राजनीतिक गलियारों में तैर रहे हैं: पहला—पार्टी के सबसे बड़े युवा चेहरे आकाश आनंद की रहस्यमयी चुप्पी, और दूसरा—2007 के 'ब्राह्मण-दलित' सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले को दोबारा जिंदा करने की जद्दोजहद।
पार्टी के भीतर और बाहर इस बात को लेकर सबसे ज्यादा कौतूहल है कि राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को फिलहाल उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात से दूर क्यों रखा गया है। लोकसभा चुनाव के दौरान आक्रामक प्रचार करने वाले आकाश की जिम्मेदारियों में फेरबदल के बाद से उन्हें यूपी और उत्तराखंड की राजनीति से रणनीतिक रूप से दूर देखा गया है।
पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों का मानना है कि आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद जिस तरह से दलित युवाओं के बीच अपनी पैठ मजबूत कर रहे हैं, उसका मुकाबला करने के लिए बसपा को अपने इकलौते युवा और कद्दावर चेहरे आकाश आनंद को फ्रंट फुट पर लाना ही होगा। चुनाव के इस निर्णायक मोड़ पर उनकी भूमिका स्पष्ट न होने से जमीनी कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
मायावती एक बार फिर अपने उस ऐतिहासिक प्रयोग को दोहराने की कोशिश में हैं, जिसने 2007 में उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी। हालांकि, तब और अब के राजनीतिक परिदृश्य में जमीन-आसमान का अंतर आ चुका है।
इस कमी को पूरा करने के लिए बसपा सुप्रीमों ने अब सीधे टिकट वितरण का दांव खेला है। जालौन की माधोगढ़ सीट से आशीष पांडेय को पहला प्रत्याशी घोषित कर पार्टी ने सवर्ण समाज को यह संदेश देने की कोशिश की है कि टिकटों के बंटवारे में उन्हें तरजीह दी जाएगी। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी आगामी चुनाव में बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना बना रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, आगामी कुछ महीने बसपा के भविष्य की दिशा तय करेंगे। पार्टी के सामने दोहरी चुनौती है: एक तरफ आकाश आनंद को सही समय पर सही कमान सौंपकर युवा वोटर्स में जोश भरना, और दूसरी तरफ सोशल इंजीनियरिंग के खोए हुए भरोसे को कागजी दावों से निकालकर जमीनी स्तर पर सच साबित करना। यदि पार्टी इन दोनों मोर्चों पर सही समय पर फैसला नहीं ले पाती, तो इसका सीधा असर उसके चुनावी प्रदर्शन पर पड़ना तय है।
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