by admin@bebak24.com on | 2026-06-26 12:38:29
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ढाका/बीजिंग: बांग्लादेश की सत्ता संभालने के बाद प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान के पहले विदेश दौरे ने दक्षिण एशियाई भू-राजनीति (Geopolitics) में नई रणनीतिक और कूटनीतिक बहस छेड़ दी है। फरवरी 2026 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नई दिल्ली आने का न्योता दिए जाने के बावजूद, तारिक़ रहमान ने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए मलेशिया (21-22 जून) और चीन (23-25 जून) को चुना।
रणनीतिक जानकार इसे सीधे तौर पर भारत की अनदेखी के बजाय ढाका की 'स्वतंत्र विदेश नीति' और कूटनीतिक संतुलन साधने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी नए राष्ट्राध्यक्ष की विदेश नीति रणनीतिक से पहले उसकी घरेलू और आर्थिक जरूरतों से तय होती है:
मलेशिया (श्रमिक बाजार की सुरक्षा): मलेशिया में इस समय लगभग 8 लाख बांग्लादेशी कामगार कार्यरत हैं, जो वहां के कुल विदेशी वर्कफोर्स का करीब 37% हैं। ये मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और एग्रीकल्चर सेक्टर में काम करते हैं। इन कामगारों से आने वाला रेमिटेंस बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इसलिए कुआलालंपुर के साथ संबंध पहली प्राथमिकता बने।
चीन (आर्थिक संकट और वित्तीय सहायता): बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था इस समय नाजुक दौर से गुजर रही है। ढाका को तुरंत बड़ी वित्तीय सहायता और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में निवेश की दरकार है। इस तीन दिवसीय दौरे में चीन और बांग्लादेश के बीच व्यापार, निवेश, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े 13 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं।
बड़ा रणनीतिक बदलाव: बांग्लादेश ने चीनी सरकारी कंपनी के साथ मोंगला में एक 'इकनॉमिक ज़ोन' विकसित करने का करार किया है। गौरतलब है कि यह वही भूमि है जिसे पहले एक भारतीय इकनॉमिक ज़ोन के लिए निर्धारित किया गया था। इसे ढाका की निवेश रणनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
तारिक़ रहमान का भारत के पहले चीन जाना उनके पारिवारिक और राजनीतिक इतिहास के अनुकूल भी है:
ऐतिहासिक संबंध: चीन और बांग्लादेश के बीच जनवरी 1977 में आधिकारिक राजनयिक संबंधों की मजबूत शुरुआत तारिक़ रहमान के पिता ज़िया-उर रहमान ने की थी। इसके बाद तारिक़ की मां और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया ने अपने कार्यकाल के दौरान रिकॉर्ड 9 बार चीन की यात्रा की।
भारत के साथ असहज अतीत: इसके विपरीत, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और इस परिवार का अतीत भारत के साथ बहुत सहज नहीं रहा है, जबकि भारत के हित हमेशा शेख हसीना की अवामी लीग के साथ जुड़े रहे हैं।
दक्षिण एशियाई मामलों की विशेषज्ञ निरूपमा सुब्रमण्यम के अनुसार, तारिक़ रहमान को बांग्लादेश में जो जनादेश मिला है, वह शेख हसीना की भारत-समर्थित नीतियों के खिलाफ है।
विपक्ष का डर: शेख हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से बेदखल होने के बाद से भारत में ही शरण लिए हुए हैं, और ढाका लगातार उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहा है। ऐसे में यदि तारिक़ रहमान पहला दौरा भारत का करते, तो बांग्लादेश की जमीनी राजनीति में विपक्ष (जैसे जमात-ए-इस्लामी) उन्हें 'भारत परस्त' बताकर घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
म्यांमार का उदाहरण: निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं कि "पहले दौरा करने से प्रतिबद्धता तय नहीं होती। हाल ही में म्यांमार के राष्ट्रपति मिन अंग भारत आए थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे चीन से दूर हो गए। चीन जानता है कि अंततः आर्थिक निर्भरता के कारण गेंद उसी के पाले में आएगी।"
भौगोलिक वास्तविकता यह है कि बांग्लादेश 94% अंतरराष्ट्रीय सीमा भारत के साथ साझा करता है (4,367 किलोमीटर लंबी सीमा), जिसके कारण उसे कूटनीति में 'इंडिया लॉक्ड' मुल्क भी कहा जाता है। इस सुरक्षा निर्भरता के बावजूद भारत न जाना भारतीय मीडिया के एक वर्ग को रास नहीं आया।
इसी बात को लेकर चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'ग्लोबल टाइम्स' ने अपने संपादकीय में भारतीय टिप्पणीकारों पर निशाना साधते हुए लिखा:
"भारतीय मीडिया का कुछ वर्ग इस बात से असहज है कि बांग्लादेशी नेता ने भारत को प्राथमिकता नहीं दी। इन आलोचनाओं के पीछे कुछ लोगों की 'बिग ब्रदर मानसिकता' (बड़े भाई का अहंकार) झलकती है, जो पड़ोसी देशों के स्वतंत्र कूटनीतिक फैसलों को अपने प्रति असम्मान के रूप में देखते हैं।"
तारिक़ रहमान का भारत के बजाय मलेशिया और चीन को चुनना चौंकाने वाला जरूर है, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक कड़वा और व्यावहारिक सच है। शेख मुजीब-उर रहमान ने नारा दिया था—"सबके साथ दोस्ती, किसी के प्रति दुर्भावना नहीं"—लेकिन मौजूदा दौर में बांग्लादेश के लिए भारत और चीन के बीच संतुलन बनाना किसी दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक तरफ भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से भारत उसका सबसे करीबी पड़ोसी है, जिसे वह चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता; तो दूसरी तरफ चीन वह 'चेकबुक' लेकर खड़ा है जिसकी बांग्लादेश की जर्जर अर्थव्यवस्था को इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत है।
भारत के लिए चिंता की बात केवल तारिक़ का बीजिंग जाना नहीं है, बल्कि मोंगला पोर्ट के पास भारतीय इकनॉमिक ज़ोन के लिए तय जमीन को चीन को सौंप देना है। यह नई दिल्ली की क्षेत्रीय कूटनीति के लिए एक बड़ा सेटबैक (झटका) है। शेख हसीना के भारत में रहने के कारण बांग्लादेशी जनता के बीच उपजे भारत-विरोधी सेंटिमेंट को भांपते हुए तारिक़ ने यह कदम उठाया है। भारत को अब 'बिग ब्रदर' की छवि से बाहर निकलकर तारिक़ रहमान सरकार के साथ नए सिरे से व्यावहारिक और रणनीतिक बातचीत शुरू करनी होगी, ताकि पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा और पारगमन हितों पर आंच न आए।
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