by admin@bebak24.com on | 2026-06-26 12:32:52
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मुंबई/दिल्ली: एक्शन और शोर-शराबे वाली फिल्मों के इस दौर में, मशहूर निर्देशक इम्तियाज़ अली एक बार फिर दर्शकों के दिलों को झकझोरने में कामयाब रहे हैं। उनकी नई फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' सिनेमाघरों में अपनी व्यावसायिक कमाई से इतर, दर्शकों के दिलों में पैदा किए गए एक गहरे और ठहरे हुए मौन को लेकर जबरदस्त चर्चा बटोर रही है। भारत-पाकिस्तान विभाजन की संवेदनशील पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म नफरत फैलाने के बजाय, इतिहास के मलबे के नीचे दबी मनुष्यता और प्रेम की चिंगारियां तलाशने का एक साहसी प्रयास है।
प्रसिद्ध फिल्म इतिहासकार यासिर उस्मान के अनुसार, यह फिल्म सरहदों के कड़े पहरों के बीच यह विश्वास जगाती है कि सीमाएं चाहे जितनी मजबूत हों, इंसानी यादें और स्मृतियां उनसे कहीं अधिक दूर तक यात्रा कर सकती हैं।
'मैं वापस आऊंगा' मुख्य रूप से भारत में रह रहे एक 95 वर्षीय बुजुर्ग (नसीरुद्दीन शाह) की कहानी है।
अधूरी हसरत: वह बुजुर्ग, जिसकी याददाश्त (स्मृति) धीरे-धीरे डिमेंशिया के कारण मिटती जा रही है, अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर पाकिस्तान स्थित अपने पुश्तैनी घर (सरगोधा) लौटने और अपने पुराने अधूरे प्यार से एक आखिरी बार मिलने की गहरी चाहत रखता है।
अतीत और वर्तमान का पुल: फिल्म के मुख्य नायक की धुंधली होती यादों के सहारे कहानी समय के दो छोरों—वर्तमान और साल 1947 के विभाजन के दौर—के बीच चलती है।
लंदन में रहने वाली फिल्म की सह-लेखिका और उपन्यासकार नयनिका मेहतानी ने फिल्म के बनने का एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा किया है:
"मैं देहरादून लिटरेचर फेस्टिवल में इम्तियाज़ अली और प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड के साथ एक 'मास्टर स्टोरीटेलर्स' सत्र को मॉडरेट कर रही थी। उसी मंच पर इम्तियाज़ ने पहली बार जिक्र किया कि वे विभाजन पर एक फिल्म बनाना चाहते हैं। मैंने उन्हें बताया कि मैंने भी हाल ही में विभाजन पर ही एक उपन्यास लिखा है।"
"कुछ समय बाद, इम्तियाज़ ने मुझसे 95 साल के एक ऐसे बुजुर्ग का आइडिया साझा किया जिसकी याददाश्त जा रही है, लेकिन उसका प्यार जिंदा है। उन्होंने मुझे 20-30 पन्नों का एक स्टोरी डॉक्यूमेंट लिखने को कहा। जब मैंने लिखा, तो उन्होंने कहा कि हमारी संवेदनशीलता आपस में मेल खाती है, और वहीं से इस खूबसूरत फिल्म की शुरुआत हुई।"
नयनिका मेहतानी के लिए सरगोधा की यह कहानी बेहद निजी भी थी, क्योंकि विभाजन के समय उनकी अपनी नानी सरगोधा में ही छूट गई थीं और उनके मुस्लिम पड़ोसियों ने ही उनके परिवार की जान बचाई थी।
'जब वी मेट', 'रॉकस्टार', 'हाईवे', 'तमाशा' से लेकर 'अमर सिंह चमकीला' तक, इम्तियाज़ अली की फिल्मों का एक खास हस्ताक्षर (सिग्नेचर स्टाइल) रहा है। उनके सिनेमा में प्रेम कभी सीधा या आसान नहीं होता, बल्कि वह एक आत्म-खोज का जरिया होता है।
'वापसी' का सफर: उनकी फिल्मों के किरदार हमेशा किसी खोई हुई चीज या पहचान की तलाश में भटकते हैं और अंततः 'वापसी' करते हैं। 'जब वी मेट' में आदित्य की वापसी हो या 'तमाशा' में वेद की अपने असली रूप में वापसी, और अब 'मैं वापस आऊंगा' के नायक की अपने अतीत की ओर वापसी।
राजनीतिक और सामाजिक परतें: नेटफ्लिक्स पर आई उनकी पिछली फिल्म 'अमर सिंह चमकीला (2024)' की तरह ही, 'मैं वापस आऊंगा' में भी इम्तियाज़ केवल एक रूमानी कहानी नहीं कह रहे हैं। वे बहुत ही संजीदगी के साथ इसके पीछे विभाजन, विस्थापन और आधुनिक राष्ट्रवाद की जटिल परतों को भी इंसानी नजरिए से छूते हैं।
फिल्म को लेकर जहां हर तरफ तारीफें हो रही हैं, वहीं कुछ आलोचकों का यह भी कहना है कि इम्तियाज़ अली इसमें अपना पुराना इमोशनल ग्राफ और विजुअल स्टाइल दोहराते नजर आते हैं। 'जब हैरी मेट सेजल' और 'लव आज कल 2' जैसी फिल्मों की विफलता के बाद उन पर फॉर्मूला दोहराने के आरोप लगे थे।
लेकिन 'मैं वापस आऊंगा' के जरिए उन्होंने साबित कर दिया है कि सुंदरता को बार-बार दोहराने से उसका असर कम नहीं होता। बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से अलग, इस फिल्म की असली कमाई वह खामोश जुड़ाव है, जो इस दौर की कड़वाहटों को पीछे छोड़कर दर्शकों को कुछ पल सिर्फ प्रेम के अहसास में ठहरने की जगह देता है।
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