by admin@bebak24.com on | 2026-06-26 12:27:07
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मनामा/दुबई: अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्ज़रलैंड में हुए ऐतिहासिक सहमति पत्र (MoU) के बाद जहां एक ओर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है और होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोला गया है, वहीं दूसरी ओर खाड़ी के अरब देशों (गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल - GCC) के भीतर एक गहरी चिंता और बेचैनी घर कर गई है। मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) के इन तेल-समृद्ध देशों को डर है कि अमेरिका-ईरान के बीच हुआ यह समझौता बेहद नाजुक है और इजरायल-हिज़्बुल्लाह के बीच जारी भीषण संघर्ष इस पूरी शांति प्रक्रिया को कभी भी पटरी से उतार सकता है।
इसी भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, 25 जून, 2026 को बहरीन की राजधानी मनामा में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खाड़ी देशों के विदेश मंत्रियों के साथ एक हाई-प्रोफाइल बैठक की, ताकि उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया जा सके।
बीबीसी अरबी की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और ईरान के तनाव के बीच फंसे खाड़ी देशों की चिंता के मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:
खाड़ी देशों को सबसे बड़ा डर इस बात का है कि अमेरिका और ईरान भले ही टेबल पर समझौता कर चुके हों, लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल नहीं बदली है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के महज 48 घंटे के भीतर इजरायल ने लेबनान पर भीषण हवाई हमले किए, जिसमें कई लोग मारे गए। वहीं हिज़्बुल्लाह के पलटवार में चार इजराइली सैनिक भी मारे गए हैं। इजरायल और हिज़्बुल्लाह का यह बढ़ता टकराव किसी भी वक्त ईरान को दोबारा युद्ध में कूदने पर मजबूर कर सकता है।
इस साल फरवरी में जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले किए थे, तब जवाब में ईरान ने उन खाड़ी देशों को सीधे निशाने पर लिया था जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे (US Military Bases) मौजूद हैं। कतर, बहरीन, कुवैत और यूएई जैसे देशों में बड़े अमेरिकी ठिकाने हैं। ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इन देशों की उस छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिसके दम पर ये खुद को दुनिया का सबसे सुरक्षित और स्थिर बिजनेस हब बताते हैं। अगर दोबारा तनाव बढ़ा, तो सबसे पहला नुकसान इन्हीं खाड़ी देशों को उठाना पड़ेगा।
जॉर्डन के अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रोफेसर हजा मजाली का इस पूरे घटनाक्रम पर कहना है:
"अमेरिका इस पूरे युद्ध में केवल अपने सहयोगी इजरायल की वजह से शामिल हुआ था। अमेरिका-ईरान का यह मौजूदा समझौता कितना लंबा टिकेगा, यह समझने के लिए हमें इसराइल की अंतिम प्रतिक्रिया और उसके अगले कदमों का इंतज़ार करना होगा। यदि इजरायल ने लेबनान या सीरिया में मोर्चे को और आक्रामक किया, तो यह समझौता महज़ एक कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।"
खाड़ी देशों (GCC) की यह चिंता पूरी तरह से व्यावहारिक और जायज है। दुबई, अबू धाबी या दोहा जैसे आधुनिक शहर आज जिस अकूत पूंजी और वैश्विक निवेश के केंद्र बने हैं, उसकी पहली शर्त 'अमन और स्थिरता' है। ईरान के ड्रोन और मिसाइलें जब इन देशों की सीमाओं के पास आकर गिरती हैं, तो इनका पूरा आर्थिक मॉडल खतरे में पड़ जाता है। खाड़ी देशों की असली दुविधा यह है कि वे चाहकर भी इस विवाद से खुद को अलग नहीं कर सकते; उनके पास अमेरिकी सुरक्षा छतरी भी है और उनके पड़ोस में बैठा ईरान भी एक कड़वी हकीकत है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का मनामा का दौरा साफ तौर पर एक 'डैमेज कंट्रोल' (स्थिति संभालने) की कवायद है। अमेरिका इन देशों को आश्वस्त करना चाहता है कि ईरान के साथ परमाणु या युद्ध विराम की बातचीत के चक्कर में वह अपने अरब सहयोगियों को अकेला नहीं छोड़ेगा। लेकिन असल पेंच इजरायल फंसा रहा है। जब तक बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार लेबनान में हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को पूरी तरह नहीं रोकती, तब तक ईरान के प्रॉक्सी संगठन शांत नहीं बैठेंगे। ऐसे में यह समझौता एक ऐसे टाइम-बम पर बैठा है, जिसका रिमोट कंट्रोल वॉशिंगटन या तेहरान के हाथ में नहीं, बल्कि तेल अवीव के फैसलों पर निर्भर करता है।
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