by on | 2026-06-20 22:45:23
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सन्तोष राय
बलिया (उत्तर प्रदेश)। पूर्वांचल की सबसे हॉट सीटों में शुमार फेफना विधानसभा में इस समय सियासत की ऐसी बिसात बिछ रही है, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के माथे पर पसीना ला दिया है। 'बेबाक 24' पर आज हम बात करेंगे उस महासंग्राम की, जिसकी सुगबुगाहट ने फेफना के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। सवाल बड़ा है—क्या कभी मुलायम सिंह यादव के सबसे खास रहे दो दिग्गज, नारद राय और अंबिका चौधरी, इस बार फेफना के दंगल में आमने-सामने होंगे?
दोस्त बने दुश्मन, राहें हुईं जुदा!
कभी एक ही दल (सपा) में रहकर जिले की राजनीति की दिशा तय करने वाले नारद राय और अंबिका चौधरी की राहें अब पूरी तरह जुदा हो चुकी हैं। अंबिका चौधरी की समाजवादी पार्टी में 'घर वापसी' हो चुकी है और वे अखिलेश यादव के पाले में खड़े हैं। वहीं दूसरी तरफ, कद्दावर नेता नारद राय ने 'साइकिल' छोड़कर 'कमल' का साथ चुन लिया है। मुलायम सिंह के ये दोनों खास सिपहसालार अब एक-दूसरे को मात देने के लिए चक्रव्यूह तैयार कर रहे हैं।
क्या उपेंद्र तिवारी और संग्राम यादव का पत्ता कटेगा?
फेफना की बिसात पर सबसे बड़ा झटका वर्तमान भाजपा और सपा के खेमों को लग सकता है। अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक, भाजपा और सपा दोनों ही अपने पुराने चेहरों के टिकट खारिज करने का मन बना रही हैं:
संग्राम सिंह यादव (सपा विधायक): जानकारों का दावा है कि संग्राम सिंह यादव फिलहाल सपा के जिलाध्यक्ष हैं। समाजवादी पार्टी के स्थापित फोरम और परंपरा के अनुसार, मौजूदा जिलाध्यक्ष को विधानसभा का टिकट मिलना मुश्किल माना जाता है। ऐसे में उनका पत्ता कटना लगभग तय माना जा रहा है।
उपेंद्र तिवारी (पूर्व मंत्री, भाजपा): लोकसभा चुनाव के वक्त से ही पूर्व मंत्री उपेंद्र तिवारी लगातार साइडलाइन चल रहे हैं। प्रतिष्ठित अखबारों में तो यहां तक खबरें छप चुकी हैं कि वे सपा से भी टिकट की जुगाड़ में थे। भाजपा उनके इस रुख और जमीनी नाराजगी को देखते हुए नया चेहरा उतार सकती है।
नारद राय को घेरने के लिए सपा का चक्रव्यूह
अगर भाजपा फेफना से नारद राय को मैदान में उतारती है, तो सपा उन्हें घेरने के लिए अंबिका चौधरी के रूप में सबसे बड़ा मोहरा चल सकती है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इस महासंग्राम को देखकर अंसारी फैमिली भी टेंशन में आ गई है। मऊ और गाजीपुर के सियासी रसूख वाले इस कुनबे की नजरें भी फेफना पर टिकी हैं। चर्चा तेज है कि इस त्रिकोणीय मुकाबले को और दिलचस्प बनाने के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भी चुप नहीं बैठेगी। बसपा से 'प्यादे' को मैदान में उतार कर नरद राय को घेरा जा सकता है।
बेबाक बात:
फेफना में इस बार विकास के दावों पर भारी 'चेहरों की जंग' होने वाली है। सालों की दोस्ती अब चुनावी दुश्मनी में बदलने को तैयार है। अगर अंबिका बनाम नारद का मुकाबला हुआ, तो यह सिर्फ एक विधानसभा का चुनाव नहीं, बल्कि बलिया की सियासत की साख की लड़ाई बन जाएगा। बिसात बिछ चुकी है, अब देखना है कि पहला शह और मात का खेल कौन शुरू करता है!
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