by admin@bebak24.com on | 2026-06-16 20:47:23
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कोलकाता/नई दिल्ली: दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों के ऐतिहासिक दलबदल और विलय के बाद चर्चा में आई 'नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया' (NCPI) ने अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम का एलान कर दिया है। ज्योतिप्रकाश चटर्जी को पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
इस बात की आधिकारिक घोषणा टीएमसी के बागी खेमे की वरिष्ठ नेता और सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने की है। यह नियुक्ति एनसीपीआई की संस्थापक शिवली कुंडू के पद छोड़ने के ठीक एक दिन बाद की गई है।
शिवली कुंडू के इस्तीफा देने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जा रहे थे कि बागी गुट का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष दस्तीदार खुद इस छोटी पार्टी की कमान संभाल सकती हैं। हालांकि, मंगलवार को पीटीआई (PTI) से बातचीत के दौरान उन्होंने इन अटकलों को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ज्योतिप्रकाश चटर्जी ही पार्टी के नए आधिकारिक अध्यक्ष होंगे।
चौंकाने वाली बात यह है कि एनसीपीआई के इस नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में खुद पार्टी के पुराने और वरिष्ठ पदाधिकारियों को कोई जानकारी नहीं है, जिससे संगठन के भीतर संवादहीनता और असंतोष खुलकर सामने आ गया है:
अंधेरे में पुराने नेता: खुद को एनसीपीआई का राष्ट्रीय संगठन महासचिव बताने वाले शांतनु डे ने इस नियुक्ति पर गहरी नाराजगी जताई है। उन्होंने मीडिया से कहा:
"मुझे नहीं पता कि ज्योतिप्रकाश चटर्जी कौन हैं। एनसीपीआई के शीर्ष स्तर पर इस समय क्या खिचड़ी पक रही है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। बड़े नेताओं (TMC के बागी सांसदों) के हमारी पार्टी में आने से हमें खुशी थी, लेकिन पुराने कार्यकर्ताओं को पूरी तरह अंधेरे में रखा जा रहा है, जिससे मैं बेहद निराश हूं।"
गौर करने वाली बात यह है कि शांतनु डे का नाम पार्टी के पुराने आधिकारिक पोस्टरों में भी महासचिव के रूप में दर्ज है, इसके बावजूद नए नेतृत्व ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया।
ममता बनर्जी की टीएमसी में बड़ी सेंधमारी कर अचानक राष्ट्रीय सुर्खियों में आई एनसीपीआई (NCPI) जमीनी स्तर पर बेहद छोटी और वित्तीय रूप से कमजोर पार्टी रही है:
यह एक अपेक्षाकृत नई और अज्ञात राजनीतिक पार्टी है, जिसे जनवरी 2023 में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में पंजीकृत किया गया था। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस पार्टी का मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के सांकराइल में स्थित है।
दिलचस्प बात यह है कि जो पार्टी आज खुद टीएमसी के बागी 'दलबदलू' सांसदों की शरणस्थली बनी है, उसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में 'राजनीतिक दल-बदलुओं को नकारें' के नारे पर चुनाव लड़ा था।
पार्टी ने त्रिपुरा में 4 उम्मीदवार उतारे थे (2 पार्टी सिंबल पर, 1 निर्दलीय और 1 का पर्चा खारिज)।
प्रदर्शन: पार्टी का चुनावी प्रदर्शन बेहद निराशाजनक था। इसके मुख्य उम्मीदवार बरजेदा त्रिपुरा को महज 536 वोट मिले थे, जो नोटा (NOTA) से सिर्फ 36 वोट अधिक थे। दूसरे उम्मीदवारों को क्रमशः 286 और 376 वोट मिले थे।
चुनाव आयोग को सौंपी गई वर्ष 2022-23 की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इस पार्टी की आर्थिक स्थिति बेहद खस्ताहाल है:
कुल चंदा: शुभचिंतकों से पार्टी को केवल ₹1,13,075 का चंदा मिला था।
कुल खर्च: चुनाव और अन्य गतिविधियों में पार्टी ने ₹1.13 लाख खर्च कर दिए।
बैलेंस: वित्तीय वर्ष के अंत में पार्टी के बैंक खाते/कैश बॉक्स में सिर्फ ₹75 शेष बचे थे।
यह भारतीय राजनीति का सबसे दिलचस्प और विरोधाभासी घटनाक्रम है। दिल्ली में बैठे टीएमसी के 20 रसूखदार और रईस सांसद तकनीकी रूप से अपनी संसद सदस्यता बचाने के लिए एक ऐसी पार्टी (NCPI) में अपना विलय करते हैं, जिसके खाते में कुल जमा पूंजी महज 75 रुपये है और जिसका त्रिपुरा में नोटा से मुकाबला था। साफ है कि यह विलय किसी विचारधारा या संगठन की मजबूती के लिए नहीं, बल्कि केवल 'दलबदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) के कानूनी शिकंजे से बचने के लिए किया गया एक राजनीतिक हथकंडा है।
अब पार्टी के नए अध्यक्ष के रूप में 'गुमनाम' ज्योतिप्रकाश चटर्जी का नाम सामने आना और पुराने महासचिव शांतनु डे का विद्रोह करना यह दिखाता है कि इस नई व्यवस्था की कमान परोक्ष रूप से काकोली घोष दस्तीदार और उनके बागी गुट के हाथ में ही है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद मजेदार होगा कि 75 रुपये के फंड वाली यह हावड़ा की छोटी सी पार्टी, 20 सांसदों के आने के बाद संसद के भीतर राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए (NDA) के साथ मिलकर क्या भूमिका निभाती है।
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