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सुरों की 'मल्लिका' का मोक्ष पथ, गंगा की लहरों में विलीन हुईं आशा ताई

by on | 2026-04-20 20:52:49

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सुरों की 'मल्लिका' का मोक्ष पथ, गंगा की लहरों में विलीन हुईं आशा ताई


वाराणसी: सुर, साधना और सात दशकों के जादुई सफर का आज काशी के मणिकर्णिका और असि के तट पर आध्यात्मिक समापन हो गया। स्वर कोकिला लता मंगेशकर के बाद भारतीय संगीत जगत के दूसरे सबसे मजबूत स्तंभ, आशा भोसले की अस्थियां आज सोमवार को मोक्षदायिनी गंगा में प्रवाहित कर दी गईं।

​अंतिम विदाई का यह दृश्य इतना मार्मिक था कि घाट पर मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। आइए जानते हैं सुरों की इस विरासत के अंतिम सफर की पूरी दास्तां।

मुंबई से काशी: मां की अंतिम इच्छा का मान

​आशा ताई का निधन 12 अप्रैल 2026 को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में हुआ था। परिजनों के मुताबिक, भले ही वे अपने जीवन में केवल एक बार काशी आई थीं, लेकिन महादेव और गंगा से उनका नाता रूहानी था। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके नश्वर अवशेषों को बाबा विश्वनाथ की नगरी में विसर्जित किया जाए।

भावुक क्षण: जब कांपते हाथों से पौत्री ने दी विदाई

​सोमवार को उनके पुत्र आनंद भोसले और पौत्री जनाई भोसले अस्थि कलश लेकर वाराणसी पहुंचे।

  • असि घाट से प्रस्थान: परिवार एक बजरे (नाव) के जरिए गंगा की बीच धारा में पहुंचा।
  • मंत्रोच्चार और विसर्जन: विद्वान ब्राह्मणों के वैदिक मंत्रोच्चार के बीच जनाई भोसले ने अपनी दादी की अस्थियों को मां गंगा की गोद में सौंप दिया।
  • कर्मकांड: विसर्जन के बाद शास्त्रोक्त विधि से पिंडदान और तर्पण की प्रक्रिया संपन्न की गई।

विरासत का अंत नहीं, विस्तार है

​पौत्री जनाई भोसले, जो आशा जी को अपनी सबसे अच्छी सहेली मानती थीं, ने सोशल मीडिया पर पहले ही लिखा था कि उन्हें नहीं पता कि अब उनके दिन की शुरुआत किसके साथ होगी। लेकिन आज काशी ने गवाही दी कि जिस कलाकार ने दुनिया को हंसना, रोना और प्यार करना सिखाया, वह अब गंगा की कल-कल में हमेशा के लिए गूंजती रहेंगी।

बेबाक टिप्पणी

​संगीत की दुनिया का एक सूरज  अस्त तो हुआ, लेकिन उसकी तपिश और चमक आने वाली कई पीढ़ियों को रास्ता दिखाएगी। आशा भोसले ने अपनी गायकी से जो ऊंचाई छुई, वह अतुलनीय है। काशी में उनका विसर्जन इस बात का प्रतीक है कि अंततः हर महान कला को परमात्मा के चरणों में ही शरण मिलती है।



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