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​डॉ. शिवपूजन राय की विरासत पर 'ठेके' का प्रहार या व्यवस्था की लाचारी?

by on | 2026-04-09 23:05:52

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​डॉ. शिवपूजन राय की विरासत पर 'ठेके' का प्रहार या व्यवस्था की लाचारी?

​गाजीपुर: इतिहास गवाह है कि जब-जब मूल्यों से समझौता हुआ है, कलम ने सवाल दागे हैं। आज गाजीपुर का शेरपुर गांव उसी दोराहे पर खड़ा है। 18 अगस्त 1942 को जिस मिट्टी ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं, आज वही मिट्टी व्यवस्था के 'नशे' में झोंकी जा रही है। अष्ट-शहीदों के नायक  डॉ. शिवपूजन राय ने जिस गौरवशाली समाज का सपना देखा था, क्या उसकी परिणति एक सरकारी शराब की दुकान है?
​सुविधाओं का अकाल, सुरा का उबाल
​गांव की बुनियादी हकीकत किसी से छिपी नहीं है। जल निकासी के नाम पर कीचड़ भरी गलियां और शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए मुहम्मदाबाद तक की लंबी दौड़—यह शेरपुर की नियति बन चुकी है। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि प्रशासन को स्वास्थ्य केंद्र की फाइलें आगे बढ़ाने में सालों लग जाते हैं, लेकिन शराब के ठेके की लॉटरी निकालने में ऐसी 'रॉकेट वाली फुर्ती' दिखाई जा रही है मानो गांव के विकास का रास्ता इसी बोतल से होकर निकलता हो।
​युवा आक्रोश: सोशल मीडिया बना रणक्षेत्र
​सोशल मीडिया पर युवाओं का विरोध केवल एक दुकान के खिलाफ नहीं, बल्कि उस दूषित सोच के खिलाफ है जो एक ऐतिहासिक गांव को महज राजस्व (Revenue) का जरिया मानती है। युवाओं का तर्क सीधा और तीखा है— "हमें दवा चाहिए, दारू नहीं; हमें स्कूल चाहिए, अहाता नहीं।" क्या प्रशासन उन युवाओं के भविष्य से खेलने का लाइसेंस बांट रहा है जिनके पूर्वजों ने देश के भविष्य के लिए फांसी के फंदों को चूम लिया था?
​प्रशासनिक जिम्मेदारी और जनभावना
​लोकतंत्र में शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता जनभावना होनी चाहिए। अगर ग्रामीण और युवा इस फैसले के खिलाफ लामबंद हैं, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि गांव के नैतिक अस्तित्व की लड़ाई है। प्रशासन को यह चेतावनी समझ लेनी चाहिए कि शेरपुर जैसे क्रांतिकारी गांव में असंतोष की एक चिंगारी बड़े बवाल का रूप ले सकती है। जिस गांव ने गोरे अंग्रेजों को नहीं बख्शा, वह काले कारनामों वाली व्यवस्था को कैसे स्वीकार करेगा?
​बेबाक निष्कर्ष
​सरकारें राजस्व से चलती हैं, लेकिन राष्ट्र का चरित्र संस्कारों और विकास से बनता है। शहीदों के सम्मान का अर्थ केवल पत्थरों पर नाम गुदवाना नहीं, बल्कि उनके उत्तराधिकारियों को एक स्वच्छ और नशामुक्त परिवेश देना है। व्यवस्था को यह तय करना होगा कि शेरपुर की पहचान 'शहीद ग्राम' के रूप में अक्षुण्ण रहेगी या इसे 'ठेकों के गांव' के कलंक के साथ जीने को मजबूर किया जाएगा?



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