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काशी में गूंजा शौर्य का शंखनाद: जब सम्राट विक्रमादित्य के प्रताप से जगमगा उठी शिव की नगरी!

by on | 2026-04-03 23:22:18

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काशी में गूंजा शौर्य का शंखनाद: जब सम्राट विक्रमादित्य के प्रताप से जगमगा उठी शिव की नगरी!


वाराणसी | “इतिहास पन्नों में नहीं, आज काशी की धरती पर साक्षात उतरा है!” धर्म, संस्कृति और न्याय के रक्षक सम्राट विक्रमादित्य का 'स्वर्णिम काल' एक बार फिर जीवंत हो उठा। वाराणसी के बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (BLW) स्थित सूर्य सरोवर मैदान में जब तीन दिवसीय “सम्राट विक्रमादित्य महोत्सव” का आगाज हुआ, तो ऐसा लगा मानो वक्त का पहिया पीछे घूम गया हो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जब संयुक्त रूप से इस भव्य उत्सव का दीप प्रज्वलित किया, तो पूरी काशी 'हर-हर महादेव' और 'जय विक्रमादित्य' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठी।

भस्म आरती की दिव्यता और शौर्य का महानाट्य

कार्यक्रम की शुरुआत ने ही दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। उज्जैन से आए पुरोहितों द्वारा जब महाकाल की भस्म आरती की दिव्य प्रस्तुति दी गई, तो समूचा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गया। लेकिन असली रोमांच अभी बाकी था!

जैसे ही महानाट्य “सम्राट विक्रमादित्य” शुरू हुआ, 225 कलाकारों ने अपनी कला से इतिहास की किताब के पन्ने हवा में लहरा दिए। तीन विशाल मंचों पर एक साथ चलती कहानियों ने दर्शकों को उस कालखंड में पहुँचा दिया जहाँ न्याय ही सर्वोपरि था।

युद्ध के दृश्य और सजीव मंचन: दंग रह गए लोग

यह महज एक नाटक नहीं, बल्कि एक युद्ध क्षेत्र का जीवंत अनुभव था। मंच पर जब 18 घोड़े, हाथी, ऊंट, रथ और पालकियाँ उतरीं, तो धूल और टापों की आवाज ने वास्तविकता का ऐसा भ्रम पैदा किया कि दर्शक अपनी सीटों से चिपक गए।

 * हाई-टेक तामझाम: आधुनिक लाइटिंग और साउंड इफेक्ट्स ने युद्ध के दृश्यों को इतना घातक और भव्य बनाया कि नई पीढ़ी के युवाओं के लिए यह किसी हॉलीवुड फिल्म से कम नहीं था।

 * न्याय का प्रतीक: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दो टूक कहा कि सम्राट विक्रमादित्य केवल राजा नहीं, बल्कि न्याय और लोककल्याण के वो मानक हैं जिनकी आज समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है।

700 किलो की ‘काल गणना’ अब काशी विश्वनाथ में!

इस महोत्सव का सबसे ऐतिहासिक पल वह था जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सीएम योगी को 700 किलोग्राम वजन वाली “विक्रमादित्य वैदिक घड़ी” भेंट की। यह घड़ी अब बाबा विश्वनाथ के धाम में स्थापित होगी, जो न केवल समय बताएगी बल्कि भारत की प्राचीन खगोलीय गणना की श्रेष्ठता का डंका बजाएगी।

प्रदर्शनी में दिखा 'अखंड भारत' का अक्स

मैदान में लगी प्रदर्शनी ने भी लोगों को खूब आकर्षित किया। आर्ष भारत, शिव पुराण, अयोध्या और मध्य प्रदेश के '84 महादेव' पर आधारित झांकियों ने श्रद्धालुओं को भारत की आध्यात्मिक जड़ों से रूबरू कराया।

> बेबाक टिप्पणी: > काशी में आयोजित यह महोत्सव केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत को फिर से पाने का एक 'सांस्कृतिक अभियान' है। जब दो राज्यों के मुख्यमंत्री एक ही मंच से गौरवशाली इतिहास की बात करते हैं, तो संदेश साफ है— अब भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है।




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