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साल में एक दिन वाली 'आस्था', और श्रृंगार गौरी की मुक्ति की पुकार!

by on | 2026-03-22 17:40:00

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साल में एक दिन वाली 'आस्था', और श्रृंगार गौरी की मुक्ति की पुकार!

वाराणसी | धर्म और कानून की दहलीज पर खड़ी काशी की एक ऐसी सच्चाई, जिसका दीदार करने के लिए भक्त साल भर पलकें बिछाए इंतज़ार करते हैं। आज चैत्र नवरात्रि की चतुर्थी है और वाराणसी का ज्ञानवापी परिसर एक बार फिर 'हर-हर महादेव' और 'जय माता दी' के जयकारों से गूंज उठा।

 बंदिशों के बीच खुले पट: सिर्फ 24 घंटे का दीदार

​कहने को तो मां श्रृंगार गौरी कण-कण में हैं, लेकिन ज्ञानवापी की पश्चिमी दीवार से सटे इस चौखट की कहानी अलग है। सुरक्षा के साये और अदालती आदेशों के पहरे में, साल के 365 दिनों में से केवल एक दिन यानी आज के दिन ही भक्तों को मां के करीब जाने की इजाजत मिली।

  • क्यों है खास? मान्यता है कि ये मां पार्वती का स्वरूप हैं।
  • इंतज़ार का अंत: रविवार सुबह जैसे ही पट खुले, आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। लोग सिर्फ दर्शन नहीं कर रहे थे, बल्कि मां की 'मुक्ति' की मन्नतें मांग रहे थे।

 पीली साड़ियां, धर्म ध्वजा और 'मुक्ति' का संकल्प

​मैदागिन के गुरु गोरक्षनाथ मंदिर से निकली शोभायात्रा ने शहर का मिजाज ही बदल दिया। पीले और लाल परिधानों में सजी महिलाएं जब हाथों में धर्म ध्वजा लेकर निकलीं, तो चैती और पचरा के सुरों ने माहौल को पूरी तरह भक्तिमय कर दिया। इसमें वे चार वादिनी महिलाएं भी शामिल थीं, जो इस मंदिर में नियमित पूजा के हक के लिए अदालत में कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं।

 अभेद्य किला बना परिसर: मोबाइल पर पाबंदी, भक्ति पर नहीं

​सुरक्षा ऐसी कि परिंदा भी पर न मार सके। श्रद्धालुओं को मोबाइल या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के साथ अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। चप्पे-चप्पे पर तैनात पुलिस बल और खुफिया एजेंसियों की निगरानी के बीच, भक्तों ने अनुशासन और असीम श्रद्धा का परिचय दिया।

 भव्य श्रृंगार और डमरूओं की गूंज

​प्रमुख पुजारी योगेश्वर व्यास के सान्निध्य में मां का अलौकिक श्रृंगार हुआ। विशेष भोग और आरती के साथ-साथ 'डमरू दल सेवा समिति' और 'सालडा समाज सेवा फाउंडेशन' ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भक्तों का मानना है कि यह सिर्फ एक पूजा नहीं, बल्कि अपने इतिहास और अस्तित्व को बचाने की एक वार्षिक कोशिश है।

बेबाक टिप्पणी: > सवाल आज भी वही खड़ा है—क्या आस्था को तारीखों और बंदिशों में बांधा जा सकता है? साल में एक दिन की अनुमति भक्तों की प्यास बुझा रही है या उस बड़ी कानूनी लड़ाई की याद दिला रही है जो अभी अधूरी है?



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