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हकीकत-ए-सोहांव: साहबों की नाक के नीचे 'स्वच्छ भारत' का दम घुट रहा, नरही बाजार में कूड़े का साम्राज्य!

by on | 2026-03-18 13:17:04

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हकीकत-ए-सोहांव: साहबों की नाक के नीचे 'स्वच्छ भारत' का दम घुट रहा, नरही बाजार में कूड़े का साम्राज्य!

बलिया (सोहांव/नरही): इसे विडंबना कहें या प्रशासन की ढिठाई, कि जिस ब्लॉक मुख्यालय की चौखट पर पंचायत के 'आला हाकिमों' का जमावड़ा लगता है, वहीं की गलियां आज बदहाली के आंसू रो रही हैं। कहावत है कि 'दीये तले अंधेरा', लेकिन सोहांव ग्राम सभा में तो अंधेरगर्दी का आलम यह है कि खुद ब्लॉक की साख कीचड़ में सनी हुई है।

सड़क है या नरक का द्वार?

​मामला सोहांव ब्लॉक के ग्राम सभा सोहांव का है। मनीष राय के दरवाजे से शुरू होकर ओमप्रकाश राय (सिपाही जी) के घर से गुजरती हुई यह सड़क नन्दू शर्मा के दरवाजे तक जाती है। लेकिन साहब, इसे सड़क कहना सड़क शब्द का अपमान होगा। जलजमाव और गंदगी के चलते यह रास्ता बीमारियों का 'एक्सप्रेस-वे' बन चुका है। ग्रामीण त्रस्त हैं, लेकिन सिस्टम मस्त है।

नरही बाजार: हॉस्पिटल मोड़ पर 'कूड़ा महोत्सव'!

​हद तो तब हो गई जब नरही बाजार के हॉस्पिटल मोड़ पर हाईवे के किनारे ही गंदगी का अंबार लगा दिया गया है।

  • अंधे हाकिम: बलिया के बड़े-बड़े 'हाकिम' हर रोज इसी हाईवे से अपनी चमचमाती गाड़ियों में गुजरते हैं।
  • गांधारी वाली कसम: ऐसा लगता है कि अफसरों ने या तो आंखों पर 'काला चश्मा' चढ़ा लिया है या फिर गांधारी की तरह कुछ भी न देखने की कसम खा ली है।
  • सवाल: जब मेन बाजार और हाईवे का यह हाल है, तो नरही की अंदरूनी गलियों का मंजर क्या होगा? जनता बेहाल है, बदबू से सांस लेना दूभर है, लेकिन सफाईकर्मी और प्रधान जी अपनी ही धुन में मगन हैं।

सफाई कर्मी 'लापता', अफसर 'माल' सरियाने में व्यस्त!

  • दावे बनाम हकीकत: स्वच्छ भारत अभियान के पोस्टर तो दीवारों पर खूब चमक रहे हैं, लेकिन धरातल पर सफाई कर्मी इस अभियान को 'गर्त' में डालने की कसम खा चुके हैं।
  • फाइलों का खेल: जब ग्रामीण गंदगी और सड़ांध से जूझ रहे हैं, तब सोहांव के 'हाकिम' अपनी एयर-कंडीशंड कुर्सी से चिपके हुए हैं। सूत्र बताते हैं कि साहबों को जनसमस्याओं से ज्यादा 'वित्तीय व्यवस्था' (बजट और बंदरबांट) को 'सरियाने' में गहरी दिलचस्पी है।

बेबाक सवाल:

​क्या जिला प्रशासन किसी बड़े हादसे या महामारी का इंतजार कर रहा है? या फिर सोहांव और नरही के ग्रामीणों की किस्मत में सिर्फ कागजों वाली सफाई ही लिखी है? अगर ब्लॉक मुख्यालय के बगल का यह हाल है, तो सुदूर गांवों की स्थिति की कल्पना ही रूह कंपा देने वाली है।

साहब, चश्मा उतारिए और सड़क पर उतरिए, क्योंकि जनता अब आपकी 'वित्तीय व्यस्तता' और इस सड़ांध का हिसाब मांग रही है!



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