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सिंहासन से नहीं, संस्कारों से अमर हुए काशी नरेश! संस्कृति को जीवन का ध्येय मानने वाले महाराजा विभूति नारायण सिंह को बेबाक नमन

by on | 2026-11-05 22:39:52

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सिंहासन से नहीं, संस्कारों से अमर हुए काशी नरेश! संस्कृति को जीवन का ध्येय मानने वाले महाराजा विभूति नारायण सिंह को बेबाक नमन

​वाराणसी (बेबाक 24): काशी की पहचान सिर्फ उसके प्राचीन घाटों, गूंजते मंदिरों और कल-कल बहती मां गंगा से ही नहीं है, बल्कि उन महान विभूतियों से भी है जिन्होंने इस अध्यात्म नगरी की आत्मा, सभ्यता और परंपराओं को हर दौर में जिंदा रखा। ऐसे ही एक कालजयी व्यक्तित्व थे काशी नरेश महाराजा डॉ. विभूति नारायण सिंह।

​5 नवंबर को उनकी जयंती के मौके पर पूरा काशी शहर अपनी इस महान सांस्कृतिक विरासत को याद करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन कर रहा है।

​धर्म को माना राजधर्म, संस्कृति को समर्पित किया जीवन

​राजसत्ता और सिंहासन बहुतों को मिलते हैं, लेकिन जन-जन के दिल में वही अमर होते हैं जो धर्म और संस्कारों को सर्वोपरि रखते हैं। महाराजा विभूति नारायण सिंह ने अपना पूरा जीवन काशी की सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं, संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा और ऐतिहासिक धरोहरों को संजोने में खपा दिया।

​संस्कृत और वेद-पुराणों के प्रकांड विद्वान:

  • ​जन्म और शिक्षा: 5 नवंबर 1927 को जन्मे महाराजा विभूति नारायण सिंह की शुरुआती शिक्षा मेयो कॉलेज (अजमेर) में हुई। इसके बाद उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से संस्कृत में परास्नातक (M.A.) की उपाधि प्राप्त की।
  • ​ज्ञान परंपरा के संरक्षक: वे वेद, पुराण और संस्कृत साहित्य के गहन अध्येता थे। भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने में उनकी भूमिका अहम रही।
  • ​BHU के कुलाधिपति: शिक्षा और संस्कृति के प्रति उनके इसी समर्पण के कारण उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कुलाधिपति (Chancellor) पद की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।

​रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला के 'धुरी'

​काशी की रामनगर वाली ऐतिहासिक रामलीला, जिसका मंचन देखने देश-विदेश से लोग आते हैं, उसे जीवंत रखने में महाराजा का योगदान अतुलनीय रहा।

  • ​वे प्रतिवर्ष नियम से रामलीला के हर प्रसंग में खुद मौजूद रहते थे और इस पौराणिक परंपरा का मार्गदर्शन करते थे।
  • ​रामनगर की रामलीला हो या फिर ऐतिहासिक भरत मिलाप, काशी के इन धार्मिक आयोजनों में राजपरिवार की उपस्थिति और संरक्षण आज भी बनारस की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का अटूट हिस्सा है।

​काशी की धरोहरों का ऐतिहासिक 'पोस्टमार्टम' और संरक्षण

​महाराजा विभूति नारायण सिंह केवल परंपराओं के ध्वजवाहक नहीं थे, बल्कि वे भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास को सहेजने वाले दूरदर्शी भी थे:

  • ​रामनगर किला संग्रहालय (1964): वर्ष 1964 में उन्होंने रामनगर किले के भीतर एक भव्य संग्रहालय की स्थापना कराई। इस म्यूजियम में राजपरिवार की दुर्लभ पांडुलिपियों, शाही परिधानों, प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों और काशी की विंटेज धरोहरों को सहेजकर जनता के लिए सुरक्षित किया गया।
  • ​श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास (1983): वर्ष 1983 में जब काशी के हृदयस्थल बाबा विश्वनाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए बोर्ड ऑफ ट्रस्टी (न्यास) का गठन हुआ, तो सर्वसम्मति से इसके अध्यक्ष पद की कमान महाराजा विभूति नारायण सिंह को ही सौंपी गई थी।

​बेबाक 24 का सलाम:

​25 दिसंबर 2000 को महाराजा विभूति नारायण सिंह ने इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया था, लेकिन बनारस की आबो-हवा, गलियों, घाटों और रामलीला के हर चौपाई में उनकी छाप आज भी उतनी ही जीवंत है।

​इतिहास गवाह है कि राजा आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन जो जनमानस के संस्कारों और संस्कृति की रक्षा करता है, वही 'काशी नरेश' बनकर अमर रहता है। महाराजा विभूति नारायण सिंह की जयंती पर बेबाक 24 परिवार का कोटि-कोटि नमन!



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