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भारत की यूएन मानवाधिकार परिषद को दो टूक, बोला- दोहरे मापदंड बंद करे

by on | 2026-10-31 12:34:14

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भारत की यूएन मानवाधिकार परिषद को दो टूक, बोला- दोहरे मापदंड बंद करे

संयुक्त राष्ट्र | बेबाक24 न्यूज़

भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उससे निष्पक्षता, पारदर्शिता और सभी देशों के साथ समान व्यवहार करने की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में परिषद की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान भारत की प्रथम सचिव भाविका मंगलानंदन ने कहा कि परिषद को अपनी साख बनाए रखने के लिए दोहरे मापदंड और राजनीतिक दबाव से बचना होगा।

उन्होंने कहा कि किसी देश को विश्वास में लिए बिना उसके खिलाफ विशेष आदेश जारी करने से जमीनी स्तर पर मानवाधिकारों की स्थिति में सुधार नहीं होता। इसके बजाय इससे परिषद के भीतर मतभेद और देशों के बीच दूरियां बढ़ सकती हैं।

बातचीत और सहयोग से मजबूत होंगे मानवाधिकार

भाविका मंगलानंदन ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के फरवरी में दिए गए बयान का उल्लेख किया। जयशंकर ने मानवाधिकार परिषद के 61वें उच्चस्तरीय सत्र में कहा था कि मानवाधिकारों को आगे बढ़ाने का प्रभावी तरीका आपसी बातचीत, क्षमता निर्माण में सहयोग और सच्ची साझेदारी है।

भारत ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए मानवाधिकारों का इस्तेमाल करना और चुनिंदा देशों को निशाना बनाना उचित नहीं है। परिषद को ऐसे आरोपों से बचना चाहिए कि मानवाधिकारों का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।

सभी देशों के लिए समान नियम की मांग

भारत ने मानवाधिकारों की समीक्षा के लिए यूनिवर्सल पीरियोडिक रिव्यू (यूपीआर) को बेहतर मंच बताया। इस व्यवस्था के तहत संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समीक्षा की जाती है।

भारत के अनुसार, इस प्रक्रिया में सभी देशों को समान महत्व मिलता है और बातचीत के जरिए सुधार पर जोर दिया जाता है। भारत वर्ष 2026-28 के कार्यकाल के लिए सातवीं बार मानवाधिकार परिषद का सदस्य बना है।

आतंकवाद को बताया मानवाधिकारों के लिए बड़ा खतरा

भारत ने आतंकवाद को मानवाधिकारों के सामने मौजूद गंभीर खतरों में से एक बताया। उसने विशेष रूप से जीवन के अधिकार पर इसके प्रभाव को रेखांकित किया और परिषद से आतंकवाद के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति अपनाने की अपील की।

विकास के अधिकार को भी मिले समान महत्व

भारत ने कहा कि नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों तथा विकास के अधिकार को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

भारत के मुताबिक, विकासशील देशों में गरीबी, बढ़ता कर्ज और आर्थिक संसाधनों तथा नई तकनीक तक सीमित पहुंच लोगों के अधिकारों के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। इन चुनौतियों का समाधान दबाव बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग से किया जाना चाहिए।

पारदर्शी कामकाज और पर्याप्त बजट की मांग

भारत ने मानवाधिकार परिषद के कामकाज में पारदर्शिता पर जोर दिया। उसने कहा कि परिषद में सुधार की प्रक्रिया सदस्य देशों के नेतृत्व में होनी चाहिए और इसके दौरान विकास तथा आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़े काम प्रभावित नहीं होने चाहिए।

भारत ने मानवाधिकार संबंधी गतिविधियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के नियमित बजट से पर्याप्त धन उपलब्ध कराने की मांग भी की। उसका कहना है कि परिषद की प्राथमिकताएं कुछ देशों या संगठनों से मिलने वाले स्वैच्छिक वित्तपोषण पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।

बार-बार समान प्रस्ताव लाने पर जताई चिंता

भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा और मानवाधिकार परिषद में एक जैसे मुद्दों पर बार-बार प्रस्ताव लाने से बचने की जरूरत बताई। उसने परिषद की रिपोर्टों को महासभा की तीसरी समिति में भेजने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई।

भारत के अनुसार, विशेष प्रतिवेदकों की रिपोर्ट सहित ऐसी सामग्री को बार-बार दूसरी संस्था में भेजने से मानवाधिकार परिषद के अलग और विशिष्ट मंच के रूप में महत्व पर असर पड़ सकता है। महासभा की तीसरी समिति सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक मुद्दों पर काम करती है।

बेबाक24 टेक

भारत का पक्ष मानवाधिकार परिषद के कामकाज में निष्पक्षता, समान व्यवहार और पारदर्शिता की मांग पर केंद्रित रहा। भारत ने आतंकवाद और विकास के अधिकार जैसे मुद्दों को भी समान महत्व देने की बात कही है। उसके अनुसार, मानवाधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दबाव के बजाय संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।



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