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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कर्ज विवाद को जातिगत अत्याचार का रूप न दें

by on | 2026-10-23 11:21:46

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सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: कर्ज विवाद को जातिगत अत्याचार का रूप न दें

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के अधिकारियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी रद्द करते हुए कहा कि कर्ज वसूली जैसे व्यावसायिक विवाद को जातिगत भेदभाव का रूप नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई के लिए जाति के आधार पर अपमान या अत्याचार से जुड़े विशिष्ट आरोप होना जरूरी है।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की परिस्थितियों और शिकायत में मौजूद विसंगतियों पर विचार करने के बाद बैंक अधिकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी तथा उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द कर दी।

क्या था पूरा मामला?

एसबीआई ने एक कंपनी को कर्ज दिया था। वर्ष 2016 में कंपनी का ऋण खाता गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) घोषित हो गया। इसके बाद कंपनी के निदेशक वाई. राजशेखर ने बैंक अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।

शिकायत में अधिकारियों पर जातिगत भेदभाव, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, गलत जानकारी देने और कंपनी को पुनरुद्धार पैकेज देने से इनकार करने जैसे आरोप लगाए गए थे। इसी आधार पर वर्ष 2019 में हैदराबाद में एससी-एसटी अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

अदालत ने क्यों रद्द की प्राथमिकी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की मूल प्रकृति कर्ज वसूली और बैंकिंग से जुड़े विवाद की है। पीठ के अनुसार, शिकायत में बैंक अधिकारियों पर निदेशकों का जाति के आधार पर अपमान करने का कोई विशिष्ट आरोप नहीं था।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी कंपनी के निदेशक का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना अपने आप में इस बात का आधार नहीं बन सकता कि बैंक द्वारा पुनर्वास पैकेज देने से इनकार करने पर आपराधिक मुकदमा चलाया जाए।

शिकायत में मिलीं विसंगतियां

पीठ ने शिकायत में मौजूद कुछ विरोधाभासों पर भी ध्यान दिया। शिकायत में कंपनी को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं द्वारा संचालित बताया गया था, जबकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार कंपनी की प्रबंध निदेशक महिला नहीं थीं।

अदालत ने इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए माना कि बैंक अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखना उचित नहीं है।

कर्ज विवाद के लिए उचित मंच का विकल्प

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फर्जी दस्तावेज, गलत जानकारी या पुनरुद्धार पैकेज नहीं मिलने जैसे मुद्दों को संबंधित कानूनी मंच पर उठाया जा सकता है। कर्ज वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) जैसे मंच पर इन विवादों का समाधान तलाशा जा सकता है।

इस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट ने पहले बैंक अधिकारियों की याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले से असहमति जताते हुए अपील स्वीकार कर ली और प्राथमिकी सहित उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द कर दी।

बेबाक24 टेक

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में कर्ज वसूली से जुड़े व्यावसायिक विवाद और जाति आधारित अत्याचार के आरोपों के बीच अंतर को रेखांकित किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी अधिनियम के तहत आपराधिक कार्रवाई के लिए संबंधित अपराध के आवश्यक तत्वों और विशिष्ट आरोपों का होना महत्वपूर्ण है। साथ ही, कर्ज, दस्तावेजों और बैंकिंग से जुड़े विवादों के समाधान के लिए उचित कानूनी मंच अपनाने पर जोर दिया गया है।



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