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वंदे मातरम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, धार्मिक कारण से न गाने पर कार्रवाई नहीं

by admin@bebak24.com on | 2026-09-23 13:47:15

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वंदे मातरम पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, धार्मिक कारण से न गाने पर कार्रवाई नहीं

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

वंदे मातरम के सभी अंतरे नहीं गाने पर सजा के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धार्मिक कारणों से कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत नहीं गाता है तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा के आधार पर ऐसे व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा जरूरी है।

2026 के संशोधन को चुनौती

यह मामला कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने 1971 के राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण कानून में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है।

याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाने की व्यवस्था की गई है।

अदालत ने याद दिलाया 1986 का फैसला

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान 1986 के बिजो इमैनुएल मामले का उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक कारणों से राष्ट्रगान नहीं गाने वाले बच्चों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की थी।

पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय गीत का कौन सा संस्करण इस्तेमाल किया जाए, यह तय करना सरकार के अधिकार क्षेत्र में हो सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा के आधार पर गीत नहीं गाता है और सम्मानजनक व्यवहार करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का सवाल अलग तरीके से देखा जाएगा।

कानून के दुरुपयोग की आशंका

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि संशोधित कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। उनका कहना था कि इस अस्पष्टता से कानून के दुरुपयोग की आशंका पैदा हो सकती है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। हालांकि, पीठ ने इस विवादित बातचीत का संज्ञान लेने से इनकार कर दिया।

बेबाक24 की राय: सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में धार्मिक स्वतंत्रता, अंतरात्मा के अधिकार और राष्ट्रीय गीत के सम्मान के बीच कानूनी संतुलन पर जोर दिया है। अदालत की आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि 2026 के संशोधित प्रावधान और सरकारी निर्देश संवैधानिक कसौटी पर किस तरह परखे जाते हैं।



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