by on | 2026-08-21 15:38:30
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नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़
कल्पना कीजिए कि आप किसी घने जंगल, ऊंचे पहाड़ या ऐसे इलाके में हैं जहां आसपास कोई मोबाइल टावर नहीं है। फोन में नेटवर्क गायब है, लेकिन आपको अचानक सिग्नल मिलने लगता है और आप कॉल या संदेश भेज पाते हैं। डायरेक्ट-टू-डिवाइस यानी डी2डी तकनीक इसी तरह की उपग्रह आधारित संचार सुविधा को संभव बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।
इस तकनीक को लेकर चर्चा इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि स्टारलिंक जैसी कंपनियां सीधे मोबाइल उपकरणों तक उपग्रह संपर्क पहुंचाने की दिशा में काम कर रही हैं। हालांकि, इसे हर फोन में अपने आप उपलब्ध सुविधा समझना सही नहीं होगा।
डायरेक्ट-टू-डिवाइस एक ऐसी उपग्रह संचार तकनीक है, जिसमें मोबाइल फोन या दूसरे समर्थित उपकरण सीधे कक्षा में मौजूद उपग्रह से संपर्क कर सकते हैं।
मौजूदा व्यवस्था में मोबाइल फोन आसपास के मोबाइल टावर से जुड़ता है। टावर आगे दूरसंचार नेटवर्क से संपर्क स्थापित करता है। लेकिन डी2डी व्यवस्था में उपग्रह ही एक तरह से मोबाइल टावर की भूमिका निभाता है।
इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जहां जमीन पर मोबाइल टावर उपलब्ध नहीं है, वहां भी उपग्रह के जरिए संपर्क स्थापित करने की संभावना बनती है।
सामान्य स्थिति में फोन का संकेत पहले नजदीकी मोबाइल टावर तक जाता है। टावर उसे संबंधित दूरसंचार नेटवर्क से जोड़ता है और फिर कॉल, संदेश या अन्य संचार सेवा उपलब्ध होती है।
डी2डी व्यवस्था में फोन का समर्थित रेडियो तंत्र उपग्रह से सीधे संपर्क कर सकता है। उपग्रह संकेतों को आगे संबंधित नेटवर्क तक पहुंचाने का काम करता है।
इस तरह संचार के लिए हर जगह जमीन पर टावर खड़ा करना जरूरी नहीं रह जाता।
नहीं।
आसमान में उपग्रह मौजूद होने भर से किसी भी फोन में डी2डी सेवा शुरू नहीं हो जाती। इसके लिए फोन के हार्डवेयर और संचार प्रणाली में आवश्यक तकनीकी समर्थन होना जरूरी है।
इसके अलावा उपग्रह सेवा देने वाली कंपनी और दूरसंचार कंपनी के बीच समझौता भी आवश्यक हो सकता है। जिस क्षेत्र में सेवा उपलब्ध कराई जानी है, वहां नियामकीय मंजूरी और तकनीकी अनुकूलता भी महत्वपूर्ण होगी।
यानी केवल नया फोन खरीद लेना पर्याप्त नहीं होगा; सेवा उपलब्ध कराने वाला नेटवर्क भी जरूरी है।
डी2डी तकनीक का सबसे बड़ा संभावित लाभ उन क्षेत्रों में हो सकता है जहां पारंपरिक मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है।
घने जंगल, पहाड़ी क्षेत्र, समुद्र के बीच के इलाके, दूरदराज के द्वीप और प्राकृतिक आपदा से प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल टावर लगाना या उन्हें चालू रखना कठिन होता है।
ऐसे स्थानों पर उपग्रह आधारित संपर्क आपातकालीन संदेश और जरूरी संचार के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
डी2डी तकनीक का इस्तेमाल केवल स्मार्टफोन तक सीमित नहीं रहने वाला। इसका उपयोग इंटरनेट से जुड़े उपकरणों में भी किया जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर खदानों में काम करने वाले उपकरण, समुद्री जहाज, दूरदराज के सेंसर, वाहन निगरानी उपकरण और दूसरे छोटे यंत्र इसके जरिए अपना आवश्यक आंकड़ा भेज सकते हैं।
ऐसे उपकरणों के लिए यह तकनीक उन स्थानों पर विशेष उपयोगी हो सकती है जहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं है।
स्टारलिंक इस क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख कंपनियों में से एक है। इसकी उपग्रह प्रणाली को सीधे मोबाइल उपकरणों तक संपर्क पहुंचाने की दिशा में विकसित किया जा रहा है।
हालांकि, डी2डी केवल स्टारलिंक की तकनीक नहीं है। अलग-अलग कंपनियां और दूरसंचार समूह उपग्रह तथा मोबाइल नेटवर्क के बीच सीधे संपर्क की तकनीक पर काम कर रहे हैं।
इसलिए भविष्य में अलग-अलग उपग्रह नेटवर्क और दूरसंचार कंपनियों के माध्यम से ऐसी सेवाएं उपलब्ध हो सकती हैं।
ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी।
डी2डी को मौजूदा मोबाइल नेटवर्क का पूर्ण विकल्प मानने के बजाय पूरक व्यवस्था के रूप में देखना अधिक उचित है। जहां टावर आधारित नेटवर्क मजबूत है, वहां पारंपरिक मोबाइल सेवा ही अधिक तेज और व्यापक हो सकती है।
उपग्रह आधारित व्यवस्था का बड़ा लाभ वहां सामने आएगा जहां जमीन आधारित नेटवर्क पहुंच नहीं पाता या किसी कारण से काम नहीं कर रहा होता।
भारत जैसे बड़े और भौगोलिक रूप से विविध देश में डी2डी तकनीक का महत्व काफी बढ़ सकता है। दूरदराज गांवों, पर्वतीय क्षेत्रों, समुद्री इलाकों और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में संपर्क व्यवस्था मजबूत करने में इसका उपयोग किया जा सकता है।
यह तकनीक डिजिटल पहुंच बढ़ाने के साथ आपदा प्रबंधन और आपातकालीन संचार के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
डी2डी तकनीक का सबसे बड़ा आकर्षण यह नहीं है कि फोन अंतरिक्ष से नेटवर्क पकड़ लेगा, बल्कि यह है कि मोबाइल संपर्क की भौगोलिक सीमाएं घट सकती हैं।
बेबाक24 का मानना है कि यह तकनीक मोबाइल टावरों का तत्काल विकल्प नहीं, बल्कि उन इलाकों के लिए एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त नेटवर्क बन सकती है जहां पारंपरिक ढांचा पहुंचाना कठिन है। भारत में इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उपकरणों की संगतता, सेवा की कीमत, नियामकीय मंजूरी और दूरसंचार कंपनियों के साथ साझेदारी कितनी प्रभावी होती है।
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