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उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल: आईएएस रिंकू सिंह राही ने मांगा कैडर तबादला, बोले- ‘संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप काम करना मुश्किल’

by admin@bebak24.com on | 2026-08-20 16:12:20

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उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल: आईएएस रिंकू सिंह राही ने मांगा कैडर तबादला, बोले- ‘संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप काम करना मुश्किल’

जालौन | बेबाक24 न्यूज़

उत्तर प्रदेश कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रिंकू सिंह राही ने अपनी एक लंबी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए प्रदेश की मौजूदा नौकरशाही व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रशासनिक संस्कृति उनके काम करने के तरीके के अनुकूल नहीं है और उन्होंने दूसरे राज्य या कैडर में स्थानांतरण की इच्छा जताई है।

राही ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप निचले स्तर तक काम करना कठिन हो गया है। उन्होंने यह भी लिखा कि यदि उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर नहीं मिलता तो प्रशासनिक पद पर रहते हुए सार्थक बदलाव लाना मुश्किल होगा।

‘मैं उत्तर प्रदेश की वर्तमान नौकरशाही संस्कृति के अनुकूल नहीं’

रिंकू सिंह राही ने अपनी पोस्ट में लिखा कि पुराने और वर्तमान सेवा अनुभवों के आधार पर उन्हें यह स्वीकार करने में संकोच नहीं है कि वह उत्तर प्रदेश की मौजूदा नौकरशाही संस्कृति के लिए उपयुक्त नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने का उनका उद्देश्य उन कार्यों को पूरा करना था, जिनकी अपेक्षा जनता से किए गए वादों को पूरा करने के लिए प्रशासन से की जाती है।

राही के मुताबिक, वह ऐसा वातावरण चाहते हैं जहां अधिकारी बिना अनावश्यक दबाव और हस्तक्षेप के जनहित में काम कर सकें।

‘भ्रष्ट व्यवस्था स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देती’

अधिकारी ने अपनी पोस्ट में आरोप लगाया कि भ्रष्ट व्यवस्था कभी नहीं चाहेगी कि उनके जैसे अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिले।

उन्होंने यह भी लिखा कि कई ईमानदार अधिकारी लंबे समय तक मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा रहने के कारण उसी व्यवस्था के तौर-तरीकों के अभ्यस्त हो जाते हैं। ऐसे में किसी नए अधिकारी का अलग तरीके से काम करना उनके लिए भी असहज स्थिति पैदा कर सकता है।

‘माफिया और भ्रष्टाचार से लड़ना प्रशासन का सामान्य दायित्व’

राही ने कहा कि माफिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करना प्रशासन का कोई असाधारण काम नहीं, बल्कि उसका बुनियादी दायित्व है।

उनका आरोप है कि जब ऐसे तत्वों को ऊपर से संरक्षण मिलने लगे तो अधिकारी का संघर्ष व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था को और खराब होने से रोकने तक सीमित हो जाता है।

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अधिकारी की ऊर्जा जनहित के काम में लगने के बजाय व्यवस्था के भीतर पैदा होने वाले अवरोधों से निपटने में खर्च होने लगती है।

‘तकनीकी दौर में बुनियादी प्रशासन मुश्किल क्यों?’

राही ने सूचना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मौजूदा दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि आज बुनियादी प्रशासन और जनसेवा सुनिश्चित करना केवल संसाधनों का नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और संस्थागत प्रतिबद्धता का सवाल है।

उन्होंने लिखा कि यदि उत्तर प्रदेश में उन्हें ऐसी तहसील तक नहीं मिल रही जहां संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप काम करते हुए माफिया और भ्रष्टाचारियों के प्रभाव से मुक्त प्रशासन दिया जा सके, तो आगे किसी बड़े प्रशासनिक पद पर सार्थक काम कर पाना भी कठिन होगा।

दूसरे राज्य में काम करके खुद को परखना चाहते हैं

राही ने कहा कि देश और मानव हित के साथ आत्मपरीक्षण की दृष्टि से उनके लिए किसी दूसरे राज्य या कैडर में काम करने का अवसर बेहतर हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अनुकूल प्रशासनिक वातावरण मिलने पर वह यह भी परखना चाहते हैं कि वह वास्तविक रूप से कितना सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

उन्होंने अंत में लिखा कि अब यह देखना है कि कौन सा राज्य या कैडर उनके अनुरोध को स्वीकार करता है और उन्हें बिना अनावश्यक बाधाओं के जनसेवा करने का अवसर देता है।

पहले भी कैडर परिवर्तन की मांग कर चुके हैं

रिंकू सिंह राही इससे पहले भी अपने तबादले और कार्यभार को लेकर चर्चा में रहे हैं। जुलाई में उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से कैडर परिवर्तन अथवा मौजूदा जिम्मेदारी के अनुरूप वेतन में कटौती की मांग की थी।

उन्होंने पर्याप्त प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं मिलने की स्थिति में कम वेतन स्वीकार करने की बात भी कही थी।

जालौन में तैनाती के बाद लगातार विवादों में रहे

राही की 5 मई को जालौन में उपजिलाधिकारी के पद पर तैनाती हुई थी। करीब 3 महीने के कार्यकाल के दौरान उनका नाम कई प्रशासनिक और राजनीतिक विवादों से जुड़ा।

उनका जनप्रतिनिधियों, लेखपालों, तहसील कर्मचारियों, नगर पालिका अधिकारियों और अधिवक्ताओं के साथ विवाद सामने आया।

जनप्रतिनिधि से विवाद के बाद बदली गई जिम्मेदारी

जालौन तहसील में तैनाती के दौरान बेतवा आइस एंड कोल्ड स्टोरेज के निरीक्षण के समय भाजपा के ब्लॉक प्रमुख रामराजा निरंजन से उनका विवाद हुआ था।

ब्लॉक प्रमुख ने अभद्रता, थप्पड़ मारने की कोशिश और धक्का-मुक्की के आरोप लगाए थे। घटना का वीडियो भी सामने आया था। इसके बाद जिलाधिकारी स्तर पर जांच कराई गई और 30 जून को राही को जालौन के उपजिलाधिकारी पद से हटाकर उरई में उपजिलाधिकारी न्यायिक की जिम्मेदारी दे दी गई।

लेखपालों और कर्मचारियों में भी नाराजगी

राही की कार्यशैली को लेकर लेखपालों में भी नाराजगी सामने आई थी। जून के अंत में लेखपालों ने सामूहिक अवकाश पर जाने का निर्णय लिया था।

शिक्षकों, व्यापारियों और तहसील कर्मचारियों की ओर से भी उनकी कार्यशैली को लेकर शिकायतों की चर्चा हुई थी।

राही ने स्वयं जिलाधिकारी को पत्र लिखकर प्रशासनिक व्यवस्था, जवाबदेही और सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर सवाल उठाए थे।

न्यायिक पद मिलने के बाद भी विवाद जारी

उरई में उपजिलाधिकारी न्यायिक की जिम्मेदारी मिलने के बाद राही ने शासन को 5 पन्नों का पत्र भेजा था। इसमें उन्होंने दावा किया था कि वर्तमान पद पर उन्हें लगभग 4 घंटे का ही काम मिल रहा है।

उन्होंने पर्याप्त जिम्मेदारी नहीं मिलने पर आधा वेतन दिए जाने पर भी आपत्ति नहीं होने की बात कही और उपयुक्त क्षेत्रीय तैनाती या कैडर परिवर्तन की मांग दोहराई।

नगर पालिका जांच को लेकर भी हुआ विवाद

उरई नगर पालिका में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के दौरान राही और अधिशासी अधिकारी राम अचल कुरिल के बीच तीखी नोकझोंक की बात सामने आई थी।

राही ने अधिशासी अधिकारी पर कथित रूप से ‘सेटिंग’ करने आने का आरोप लगाया था, जबकि अधिकारी का कहना था कि मांगे गए अभिलेख सक्षम अधिकारी को उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

बाद में नगर पालिका की जांच समिति में राही की जगह वर्तमान उपजिलाधिकारी को शामिल किया गया।

अधिवक्ताओं ने भी उठाए सवाल

अगस्त में जिला बार एसोसिएशन ने भी राही की न्यायिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। अधिवक्ताओं ने राजस्व अदालतों के बहिष्कार की चेतावनी दी थी और पूर्व की शिकायतों का भी हवाला दिया था।

इस तरह 5 मई से अब तक राही की तैनाती से जुड़े कई विवाद सामने आ चुके हैं और वह लगातार प्रशासनिक चर्चाओं के केंद्र में बने हुए हैं।

बेबाक24 का नजरिया

रिंकू सिंह राही की ताजा पोस्ट ने उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में अधिकारी की स्वतंत्रता, राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव और संवैधानिक व्यवस्था के वास्तविक क्रियान्वयन पर बहस छेड़ दी है। लेकिन उनके आरोप गंभीर होने के बावजूद उन्हें अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा।

बेबाक24 का मानना है कि यदि किसी अधिकारी को लगता है कि वह संवैधानिक दायित्वों के अनुरूप काम नहीं कर पा रहा है, तो उसके आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही अधिकारी की कार्यशैली को लेकर सामने आई शिकायतों की भी समान गंभीरता से जांच जरूरी है। व्यवस्था में सुधार तभी संभव है, जब आरोप लगाने वाले और आरोप झेलने वाले—दोनों की जवाबदेही समान रूप से तय हो।



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