by on | 2026-08-14 14:33:35
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नई दिल्ली: संसद का 25 दिन लंबा मॉनसून सत्र गुरुवार को समाप्त हो गया। इस दौरान सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखा टकराव देखने को मिला। विपक्ष का दावा है कि उसके दबाव और एकजुटता के कारण सरकार को परिसीमन, एक देश-एक चुनाव और उच्च शिक्षा सुधार से जुड़े कुछ प्रस्ताव आगे बढ़ाने से पीछे हटना पड़ा। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस पर बंटी हुई है। कुछ इसे विपक्ष की रणनीतिक सफलता मानते हैं, जबकि कुछ का कहना है कि सरकार ने राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इन प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ाया।
सत्र के दौरान 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन व्यापक चर्चा के लिए सदन का काफी कम समय उपलब्ध रहा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के अनुसार, लोकसभा की उत्पादकता 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही।
विपक्ष सबसे पहले परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक का उल्लेख कर रहा है। कांग्रेस का दावा है कि सरकार इसे मॉनसून सत्र में आगे बढ़ाने की तैयारी में थी, लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों के विरोध और विपक्ष की एकजुटता के कारण ऐसा नहीं हो सका।
दक्षिण भारत के कई राज्यों को आशंका है कि परिसीमन के बाद उनकी लोकसभा सीटों का अनुपातिक प्रभाव घट सकता है। तमिलनाडु विधानसभा ने भी लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बनाए रखने के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया।
दूसरा मुद्दा विदेशी अंशदान (विनियमन) यानी एफसीआरए संशोधन विधेयक है। सरकार इस विधेयक को लेकर आई, लेकिन विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेज दिया गया। कांग्रेस ने इसे अपने दबाव का परिणाम बताया, जबकि सरकार का कहना है कि विधेयक पर व्यापक विचार-विमर्श के लिए इसे समिति को भेजा गया।
उच्च शिक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण सुधार विधेयक को भी इस सत्र में पेश नहीं किया गया। प्रस्ताव में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग समेत कुछ नियामक संस्थाओं की जगह एक केंद्रीय निकाय बनाने की बात थी।
इसी तरह एक देश-एक चुनाव से जुड़ा प्रस्ताव भी इस सत्र में सदन के सामने नहीं आया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि सर्वदलीय बैठक में सरकार की ओर से इसे लाने के संकेत दिए गए थे।
इसके अलावा उस संविधान संशोधन प्रस्ताव पर भी आगे कार्रवाई नहीं हुई, जिसमें प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को किसी मामले में गिरफ्तारी के बाद लगातार 30 दिन तक जमानत नहीं मिलने की स्थिति में 31वें दिन पद से स्वतः हटाने का प्रावधान प्रस्तावित था।
एफसीआरए संशोधन विधेयक को लेकर कांग्रेस ने दावा किया कि सरकार के रुख में नरमी के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ परिस्थितियां थीं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की बातचीत का संदर्भ दिया।
हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना है कि उस बातचीत में क्या चर्चा हुई, इसकी सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए इसे किसी बाहरी दबाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
इसी बीच कई ईसाई संगठनों ने 9 अगस्त को सरकार से विधेयक को जेपीसी के पास भेजने या वापस लेने की मांग की थी। इसके बाद गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में इसे जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखा, जिसे हंगामे के बीच मंजूरी मिल गई।
मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले ऐसी खबरें थीं कि सरकार परिसीमन से जुड़े विधेयक के लिए जरूरी विशेष बहुमत जुटाने की कोशिश कर रही है। इस सिलसिले में कई राजनीतिक दलों से संपर्क की खबरें भी सामने आई थीं।
सरकार के कुछ नेताओं की विपक्षी नेताओं से बातचीत ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा बढ़ाई। लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों में इस मुद्दे पर बढ़ते विरोध ने तस्वीर बदल दी।
तमिलनाडु विधानसभा की ओर से 543 सीटों को बनाए रखने के पक्ष में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद सरकार के लिए इस मुद्दे को आगे बढ़ाना राजनीतिक रूप से अधिक जटिल हो गया।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को आशंका थी कि दोबारा विधेयक लाकर उसे पर्याप्त समर्थन नहीं मिला तो यह राजनीतिक झटका बन सकता है। इसलिए उसने फिलहाल इसे आगे नहीं बढ़ाने का फैसला किया।
मॉनसून सत्र की शुरुआत के दौरान दिल्ली में युवा प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस कार्रवाई भी विपक्ष की रणनीति का प्रमुख आधार बनी।
विपक्ष लंबे समय तक गृह मंत्री अमित शाह से इस मामले पर संसद में जवाब की मांग करता रहा। इसके कारण सदन में कई दिनों तक गतिरोध बना रहा।
वरिष्ठ पत्रकारों के एक वर्ग का मानना है कि रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर युवाओं का आंदोलन विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का बड़ा आधार बना। इन मुद्दों ने कई विपक्षी दलों को एक मंच पर आने का अवसर दिया।
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि संसद का लगातार बाधित रहना विपक्ष के लिए भी पूरी तरह लाभदायक नहीं रहा, क्योंकि प्रश्नकाल तक नियमित रूप से नहीं चल सका।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसे सीधे तौर पर विपक्ष की जीत या सरकार की हार कहना मुश्किल है।
एक ओर सरकार ने कुछ महत्वपूर्ण और विवादित प्रस्तावों को इस सत्र में आगे नहीं बढ़ाया और एफसीआरए विधेयक को जेपीसी के पास भेजा गया। दूसरी ओर, सरकार 12 विधेयक पारित कराने में सफल रही।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी माना कि विधायी कामकाज के लिहाज से सत्र सफल रहा, लेकिन बहस और चर्चा के मामले में यह प्रभावी नहीं रहा।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 11 में से 9 विधेयकों पर लोकसभा में 15 मिनट से कम चर्चा हुई। इनमें 7 विधेयकों पर बहस 10 मिनट से भी कम चली।
सबसे अधिक चर्चा सार्वजनिक परीक्षाओं में अनुचित साधनों की रोकथाम से संबंधित विधेयक पर हुई, जिस पर कुल 17 घंटे 34 मिनट बहस हुई।
वहीं, जन्म और मृत्यु पंजीकरण संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में मिलाकर केवल 54 मिनट चर्चा हुई।
कई मामलों में अधिक विस्तृत चर्चा राज्यसभा में हुई, जबकि लोकसभा में कुछ विधेयक बहुत कम समय में पारित कर दिए गए।
मॉनसून सत्र से यह संकेत जरूर मिला कि सरकार को कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दों पर विपक्ष और राज्यों के दबाव का सामना करना पड़ा। वहीं विपक्ष सरकार को सभी प्रमुख मुद्दों पर निर्णायक रूप से पीछे हटाने में पूरी तरह सफल नहीं रहा।
इस लिहाज से मॉनसून सत्र को न तो पूरी तरह सरकार की जीत कहा जा सकता है और न ही विपक्ष की स्पष्ट जीत। विपक्ष ने कुछ मुद्दों पर दबाव बनाया, लेकिन सरकार विधायी कामकाज का अपना बड़ा हिस्सा पूरा करने में सफल रही।
अब सवाल यह है कि अगले सत्र में परिसीमन, एक देश-एक चुनाव, उच्च शिक्षा सुधार और छात्र आंदोलनों से जुड़े मुद्दे किस रूप में फिर सामने आते हैं।
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