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सुरक्षा मानकों की अनदेखी: वाराणसी में कोचिंग सेंटरों पर बड़ी कार्रवाई, व्यवस्थागत भ्रष्टाचार पर उठे गंभीर सवाल

by on | 2026-06-23 22:50:33

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सुरक्षा मानकों की अनदेखी: वाराणसी में कोचिंग सेंटरों पर बड़ी कार्रवाई, व्यवस्थागत भ्रष्टाचार पर उठे गंभीर सवाल

वाराणसी: देश में जब भी कोई बड़ा अग्निकांड होता है, तब-तब प्रशासनिक अमला नींद से जागता है और आनन-फानन में कार्रवाई की औपचारिकताएं शुरू हो जाती हैं। हाल ही में लखनऊ में हुई एक घटना के बाद वाराणसी प्रशासन ने भी सक्रियता दिखाई है। वाराणसी विकास प्राधिकरण (VDA) और फायर ब्रिगेड की संयुक्त टीम ने दुर्गाकुंड क्षेत्र में संचालित नामचीन कोचिंग संस्थानों—'आकाश कोचिंग' के दो केंद्रों और 'एलन (Allen) कोचिंग' पर छापेमारी कर उन्हें सील कर दिया।

​इस कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब तक कोई बड़ी त्रासदी नहीं होती, तब तक जिम्मेदार विभाग और संस्थान मूकदर्शक बने रहते हैं।

​दो हजार छात्रों की सुरक्षा दांव पर: मानकों की खुली धज्जियां

​जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। जिस परिसर में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश का सपना लेकर लगभग दो हजार छात्र अध्ययनरत थे, वहां आपातकालीन निकासी के सारे रास्ते बंद थे।

अवरुद्ध निकास मार्ग: संस्थान का मुख्य मार्ग मात्र 4 फीट चौड़ा पाया गया। आपातकालीन सीढ़ियां मानकों के अनुरूप नहीं थीं और एक एग्जिट गेट पर एयर कंडीशनर (AC) की आउटर यूनिट्स तथा भारी मात्रा में कबाड़ जमा था।


अवैध निर्माण की आशंका: निरीक्षण के दौरान जब VDA के अधिकारियों ने भवन का स्वीकृत नक्शा और अन्य संबंधित दस्तावेज मांगे, तो संचालक कोई भी वैध कागजात प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे।


​चीफ फायर ऑफिसर आनंद सिंह राजपूत ने स्पष्ट किया कि शैक्षणिक संस्थानों के लिए न्यूनतम दो चौड़े निकास द्वार, अवरोध-मुक्त सीढ़ियां, स्मोक डिटेक्टर, फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम और अनिवार्य रूप से 'फायर एनओसी' (NOC) का होना आवश्यक है। इन केंद्रों में इन सभी नियमों की खुलेआम अनदेखी की जा रही थी।

​मौत के 'लाक्षागृह' बने मैरेज हॉल: मोम की तरह पिघलने वाले इंटीरियर और जुटती हजारों की भीड़

​कोचिंग और अस्पतालों से इतर, शहर में एक और बड़ा 'टाइम बम' टिक-टिक कर रहा है, जिसकी ओर प्रशासन पूरी तरह आंखें मूंदे बैठा है—शहर के सैकड़ों मैरेज हॉल और लॉन। आज काशी के कोने-कोने में खुले ये मैरेज हॉल किसी 'लाक्षागृह' से कम नहीं हैं।

सजावट के नाम पर बारूद: इन मैरेज हॉलों की भव्यता दिखाने के लिए फाइबर, सिंथेटिक फॉल्स सीलिंग, थर्माकोल और सस्ते प्लास्टिक/प्लास्टर के पर्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। ये सामग्रियां ऐसी हैं कि आग की एक छोटी सी चिंगारी लगते ही ये मोम की तरह पिघलकर बरसने लगेंगी और चंद सेकेंड्स में पूरे परिसर को धुएं के गुबार और जहरीली गैस में तब्दील कर देंगी।


निकास के नाम पर संकरी गलियां: शादियों के सीजन में इन हॉलों में एक समय पर हजारों की भीड़ जुटती है। विडंबना देखिए कि इनमें से अधिकांश के पास न तो पर्याप्त पार्किंग है और न ही आपातकालीन निकास। संकरी गलियों में स्थित इन मैरेज हॉलों तक किसी हादसे के वक्त दमकल की गाड़ियों का पहुंचना भी नामुमकिन है।


कागजी एनओसी का खेल: सबसे गंभीर सवाल यह है कि सुरक्षा मानकों की ऐसी खुली अनदेखी के बावजूद इन्हें हर साल फायर डिपार्टमेंट से एनओसी (NOC) कैसे मिल जाती है? क्या मोटी रकम के बदले हजारों बारातियों और मेहमानों की जिंदगी का सौदा किया जा रहा है?


​केवल कोचिंग ही क्यों? 'बडे अस्पतालों की जांच कब?

​प्रशासन की इस त्वरित कार्रवाई पर जनता और विश्लेषकों ने कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दिल्ली और अन्य महानगरों में हुए हादसों के बाद वाराणसी के होटलों की भी जांच की गई थी, लेकिन वह मुहिम भी समय के साथ ठंडी पड़ गई।

​आज वाराणसी की संकरी गलियों और रिहायशी इलाकों में सैकड़ों की संख्या में होटल और गेस्ट हाउस धड़ल्ले से चल रहे हैं, जहां सुरक्षा के नाम पर भारी चूक मौजूद है। इसके अलावा, शहर के  छोटे-बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की स्थिति भी बेहद नाजुक है। तंग रास्तों पर बहुमंजिला इमारतों में चल रहे इन चिकित्सालयों में यदि कभी अग्नि दुर्घटना होती है, तो लाचार मरीजों को सुरक्षित निकालना असंभव होगा। प्रशासन की बंद आंखें इन पर कब खुलेंगी, यह बड़ा सवाल है।

​संबंधित विभागों पर गाज कब? भ्रष्टाचार और 'मोटी वसूली' के गंभीर आरोप

​इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि इन संस्थानों, मैरेज हॉलों और होटलों को बिना मानकों के संचालन का लाइसेंस और अनुमति आखिर मिली कैसे? सूत्रों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, फायर ब्रिगेड और स्थानीय पुलिस विभाग के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत और 'मोटी मासिक/सालाना वसूली' के खेल के कारण ही ऐसे अवैध और असुरक्षित व्यावसायिक केंद्र फलते-फूलते हैं।

​जब तक भ्रष्टाचार में लिप्त इन विभागीय अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी और उनकी जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों को सील करने जैसी तात्कालिक कार्रवाइयों से जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली।

​ 'काशी बदहाल' और कागजी चौकसी

​लाखों रुपए की भारी-भरकम फीस वसूलने वाले कॉर्पोरेट कोचिंग ब्रांड्स से लेकर शादियों के नाम पर लाखों ऐंठने वाले मैरेज हॉल संचालकों के लिए इंसानी जीवन केवल एक कमोडिटी बनकर रह गया है। आज काशी जैसी प्राचीन और घनी आबादी वाले शहर की कानून और सुरक्षा व्यवस्था कागजी दावों और 'फंडिंग' के जाल में उलझकर बदहाल हो चुकी है।

​प्रशासन को केवल घटनाओं के बाद 'रिएक्ट' करने की नीति छोड़कर एक स्थायी, निष्पक्ष और पारदर्शी ऑडिट प्रणाली विकसित करनी होगी। यदि समय रहते होटलों, अस्पतालों, कोचिंग सेंटरों और इन मौत के लाक्षागृह बने मैरेज हॉलों का कड़ाई से निरीक्षण नहीं किया गया, तो शहर को किसी बड़े और आत्मघाती हादसे से बचाना मुश्किल होगा।



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