by admin@bebak24.com on | 2026-06-21 20:55:20
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छत्रपति संभाजीनगर/मुंबई: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (यूबीटी) को एक और करारा झटका लगा है। हिंगोली से सांसद नागेश पाटिल आष्टीकर ने रविवार (21 जून) को तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए आधिकारिक तौर पर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया है।
सोशल मीडिया पर एक वीडियो संदेश जारी कर आष्टीकर ने अपने इस फैसले की पुष्टि की। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि उन्होंने अपनी विचारधारा नहीं बदली है, बल्कि वे केवल 'एक शिवसेना से दूसरी शिवसेना' में शामिल हुए हैं।
सांसद नागेश आष्टीकर ने पार्टी छोड़ने के पीछे दो सबसे मुख्य वजहें बताई हैं:
राउत के बयानों पर पलटवार: आष्टीकर ने कहा कि 18 जून तक उन्होंने पार्टी छोड़ने का कोई अंतिम फैसला नहीं लिया था, लेकिन उसके बाद पार्टी के कुछ बड़े नेताओं द्वारा बागी सांसदों के खिलाफ की गई अमर्यादित टिप्पणियों ने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। माना जा रहा है कि उनका इशारा संजय राउत की ओर था, जिन्होंने बागी सांसदों को कड़ी चेतावनी दी थी।
विकास कार्यों के लिए फंड की कमी: आष्टीकर ने बताया कि विपक्ष में रहने के कारण उनके लोकसभा क्षेत्र के विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़े थे। सालाना मिलने वाले 5 करोड़ रुपये के सांसद निधि (एमपीलैड) से क्षेत्र का विकास संभव नहीं था और पिछले दो साल से लगातार कोशिशों के बाद भी वे महायुति सरकार से अतिरिक्त फंड नहीं ला पा रहे थे।
नागेश आष्टीकर का बयान:
"जनता ने मुझे बहुत उम्मीदों के साथ चुनकर संसद भेजा है। अगर विपक्ष में रहने के कारण मैं अपने क्षेत्र के लोगों और कार्यकर्ताओं के काम ही नहीं करवा पाऊंगा, तो सांसद रहने का क्या फायदा? क्षेत्र के विकास के लिए मेरे पास मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ आने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था।"
राजनीतिक हलकों में आष्टीकर का यह इस्तीफा शिवसेना (यूबीटी) के लिए एक बड़े खतरे की घंटी माना जा रहा है:
बैठक से गायब थे 6 सांसद: गौरतलब है कि 17 जून को दिल्ली में उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई संसदीय दल की बैठक से 6 सांसद गायब थे। इनमें नागेश आष्टीकर के अलावा संजय दिना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे और ओमप्रकाश राजे निम्बालकर शामिल थे।
दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law): लोकसभा में वर्तमान में उद्धव गुट के कुल 9 सांसद हैं। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि 9 में से दो-तिहाई (यानी कम से कम 6) सांसद एक साथ पार्टी छोड़ते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा और उनकी सदस्यता सुरक्षित रहेगी। आष्टीकर के इस कदम के बाद बाकी 5 सांसदों के भी जल्द ही शिंदे गुट में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं।
नागेश आष्टीकर का उद्धव गुट को छोड़कर शिंदे गुट में जाना महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े डोमिनो इफेक्ट (एक के बाद एक इस्तीफों की झड़ी) की शुरुआत हो सकता है। यह घटनाक्रम दिखाता है कि चुनाव से ठीक पहले विपक्ष के सांसद सत्ता पक्ष के 'फंड और विकास' के चक्रव्यूह में फंस रहे हैं। किसी भी सांसद के लिए अपने क्षेत्र में काम न करा पाना और कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेलना सबसे बड़ा राजनीतिक सुसाइड होता है, और आष्टीकर ने इसी को अपनी ढाल बनाया है।
रणनीतिक रूप से देखें तो असली खेल 'दो-तिहाई' के जादुई आंकड़े (6 सांसद) का है। अगर 17 जून की बैठक से गायब रहे बाकी 5 सांसद भी आष्टीकर की राह पर चल पड़ते हैं, तो संसद के भीतर उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) का अस्तित्व लगभग खत्म हो जाएगा और लोकसभा अध्यक्ष भी एकनाथ शिंदे की शिवसेना को ही असली वैधानिक दल की मान्यता दे देंगे। अमित शाह ने हाल ही में कोल्हापुर की रैली में जो कहा था कि 'अब शिंदे गुट नहीं, बल्कि केवल एक ही शिवसेना है', आष्टीकर का यह दलबदल उसी पटकथा का अगला हिस्सा नजर आता है।
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