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निक्कू राय का बड़ा वार: 'मुख्तार के शागिर्द' अतुल राय को दिखाया आईना, ए.के. शर्मा पर टिप्पणी को बताया 'हताशा'!

by on | 2026-02-05 15:23:13

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निक्कू राय का बड़ा वार: 'मुख्तार के शागिर्द' अतुल राय को दिखाया आईना, ए.के. शर्मा पर टिप्पणी को बताया 'हताशा'!

बलिया/लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में 'गिरगिट' की तरह रंग बदलने वाले चेहरों की कमी नहीं है, लेकिन जब कोई अतीत के दलदल में धंसा शख्स विकास के चेहरे पर कीचड़ उछालने की कोशिश करे, तो जवाब देना जरूरी हो जाता है। पूर्व मंत्री और दिग्गज भाजपा नेता नारद राय के पुत्र नरेन्द्र राय 'निक्कू' ने अतुल राय की बयानबाजी की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें उनकी 'औकात' और 'अतीत' दोनों याद दिला दी है।
​सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलते हुए निक्कू राय ने साफ लफ्जों में कह दिया है कि मंत्री ए. के. शर्मा पर सवाल उठाने वाले अतुल राय का अपना चरित्र 'दोहरा' और 'दागदार' है।
​"माफिया की पाठशाला से निकले नेता, न सिखाएं नैतिकता"
​निक्कू राय ने सीधा प्रहार करते हुए कहा कि जिस अतुल राय ने सालों तक मुख्तार अंसारी के नाम का सिक्का चलाया और माफिया के खौफ की आड़ में अपनी राजनीतिक बिसात बिछाई, आज वही व्यक्ति 'नैतिकता का ठेकेदार' बन बैठा है। जनता भूली नहीं है कि अतुल राय की 'राजनीतिक ताकत' का असली रिमोट कंट्रोल किसके पास था। मुख्तार के साये में रहकर फैसले लेना और उसी की छाया में खुद को नेता कहलवाना ही अतुल राय की असली हकीकत रही है।
​पसीने की कमाई बनाम माफिया की मलाई
​निक्कू राय ने मंत्री ए.के. शर्मा और अतुल राय के बीच का अंतर स्पष्ट करते हुए लिखा:
"एक तरफ वो मंत्री (ए.के. शर्मा) हैं जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई, कड़ी मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपनी जगह बनाई है, तो दूसरी तरफ वो लोग हैं जिन्होंने अपराधियों के नाम पर दहशत फैलाकर अपनी पहचान खड़ी की। ए.के. शर्मा ने किसी बाहुबली की गोद में बैठकर राजनीति नहीं सीखी।"
​इतिहास पलटेगा, तो उंगली खुद पर उठेगी
​ बेबाक 24 के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, निक्कू राय ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि अतुल राय को दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। जब इतिहास के पन्ने पलटे जाएंगे, तो माफिया संस्कृति से जुड़े उनके तार खुद-ब-खुद उनकी पोल खोल देंगे।
​बेबाक विश्लेषण:
जनता अब जागरूक है। उसे पता है कि कौन विकास और सुशासन का झंडा बुलंद कर रहा है और कौन माफिया की सड़ चुकी विरासत को ढोकर राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की आखिरी कोशिश कर रहा है। अतुल राय की हताशा यह बता रही है कि अब 'भय की राजनीति' का अंत हो चुका है और 'विकास की राजनीति' अपना रंग दिखा रही है।



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