by on | 2026-02-14 01:32:32
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बेबाक 24 की काशी की गलियों से एक विशेष रिपोर्ट...
सन्तोष राय
वाराणसी: जब भक्ति के रंग में लोक-परंपरा का तड़का लगता है, तो नज़ारा कुछ ऐसा होता है कि देवता भी स्वर्ग से देखने को आतुर हो जाएं। विजया एकादशी की शाम, धर्मनगरी काशी ने वह दृश्य देखा जो केवल आँखों से नहीं, आत्मा से महसूस किया जाता है। महादेव अब सिर्फ 'कालों के काल' नहीं, बल्कि सगुन की हल्दी से सजे 'अलौकिक दूल्हे' हैं।
डमरुओं की थाप और शंखों की गूँज: टेढ़ीनीम तक उमड़ा जनसैलाब
उत्सव का आगाज़ हुआ बांसफाटक स्थित धर्म निवास से। श्रीमहंत लिंगिया महाराज के सानिध्य में जब शोभायात्रा निकली, तो मानो पूरी काशी सड़क पर उतर आई। डमरुओं की वो गूंजती थाप और शंखों का वो उद्घोष... हर कंकड़ आज शंकर हो गया था। पुष्पवर्षा के बीच झूमते भक्तों का उत्साह यह बता रहा था कि अपने आराध्य को दूल्हा बनते देखना उनके लिए क्या मायने रखता है।
52 थालों का चढ़ावा और 'ससुराली' स्नेह
इस भव्य आयोजन की भव्यता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 52 थालों में श्रद्धा सजी हुई थी। फल, मेवे, चंदन और मांगलिक सामग्री से लदे इन थालों को लेकर जब श्रद्धालु चले, तो दृश्य अद्भुत था। सोने पर सुहागा यह कि सारंगनाथ मंदिर से आए 'ससुरालीजन' जब पगड़ी बांधकर रस्में निभाने पहुंचे, तो नाता और भी गहरा हो गया।
जब हल्दी के रंग में रंगे 'भोले'
टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर जो हुआ, वो साक्षात शिव-शक्ति के मिलन की पहली आहट थी। 11 वैदिक ब्राह्मणों के मंत्रोच्चार के बीच जब बाबा की पंचबदन प्रतिमा पर पीली हल्दी चढ़ाई गई, तो पूरा परिवेश पीताभ हो उठा।
> लोकगीतों की मिठास:
> "पीली-पीली हल्दी भोला के लगावा सखी..."
> महिलाओं के कंठ से फूटते ये मंगलगीत इस बात का प्रमाण हैं कि काशी के लिए शिव कोई दूर बैठे भगवान नहीं, बल्कि उनके अपने घर के लाडले दूल्हे हैं।
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राजसी श्रृंगार और नवरत्न जड़ित छत्र
शाम होते-होते बाबा का राजसी श्रृंगार किया गया। नवरत्न जड़ित छत्र के नीचे जब दूल्हा स्वरूप बाबा विश्वनाथ विराजे, तो उनकी आभा ऐसी थी कि सूरज की रोशनी भी फीकी पड़ जाए। पारंपरिक आभूषणों और सुगंधित पुष्पमालाओं से सजे महादेव का यह स्वरूप देख हर भक्त की आँखें नम थीं और हृदय में केवल श्रद्धा का ज्वार था।
महाशिवरात्रि की दस्तक
विजया एकादशी पर चढ़ी यह हल्दी महज़ एक रस्म नहीं, बल्कि उस महा-उत्सव का शंखनाद है जिसे दुनिया महाशिवरात्रि के रूप में मनाती है। सगुन हो चुका है, हल्दी चढ़ चुकी है, और अब काशी को इंतज़ार है अपने बाबा की उस बारात का, जिसमें भूत-पिशाच से लेकर देवता तक बाराती बनेंगे।
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