by on | 2026-01-31 20:22:08
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प्रयागराज: युपी में अपराधियों के घुटनों में गोली मारने की 'प्रथा' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि इंसाफ की तराजू न्यायपालिका के पास है, पुलिस की पिस्टल में नहीं। 'हाफ एनकाउंटर' यानी पैरों में गोली मारने के बढ़ते मामलों पर कोर्ट ने सरकार और पुलिस प्रशासन को आइना दिखाया है।
"सजा देना आपका काम नहीं": कोर्ट की दो टूक
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने राजू उर्फ राजकुमार की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए जो कहा, उसने पुलिस महकमे में खलबली मचा दी है। कोर्ट ने तीखे शब्दों में कहा:
* न्यायपालिका सर्वोपरि: किसी भी अपराधी को सजा देने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ अदालतों को है। पुलिस कानून की रक्षक है, 'जल्लाद' या 'जज' नहीं।
* संवैधानिक मर्यादा: पुलिस मुठभेड़ें कानून के शासन और संविधान का मजाक नहीं बननी चाहिए।
ACS होम और DGP की 'क्लास'
मामला इतना गंभीर था कि हाईकोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद और DGP राजीव कृष्णा को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का फरमान सुना दिया।
* अधिकारियों ने सफाई दी कि 'गाइडलाइन्स' जारी कर दी गई हैं और उल्लंघन पर कार्रवाई होगी।
* लेकिन कोर्ट ने सवाल दागा— अगर गाइडलाइन्स हैं, तो फिर ये 'पैरों में गोली' लगने का सिलसिला रुक क्यों नहीं रहा?
बेबाक सवाल: चोरी-लूट में भी एनकाउंटर?
कोर्ट ने उन घटनाओं पर गहरी चिंता जताई जहाँ छोटे-मोटे अपराधों (जैसे चोरी या झपटमारी) में भी पुलिस आरोपी के पैर में गोली मार देती है।
कोर्ट की बेबाक टिप्पणी: "हैरानी की बात है कि इन मुठभेड़ों में किसी पुलिसवाले को खरोंच तक नहीं आती, लेकिन आरोपी के पैर में गोली जरूर लग जाती है। यह पूरी स्क्रिप्ट संदेह के घेरे में है।"
हाईकोर्ट का फाइनल अल्टीमेटम
* लिमिट में रहे पुलिस: मुठभेड़ को 'सजा का शॉर्टकट' न बनाया जाए।
* सुप्रीम कोर्ट के नियम: पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन पत्थर की लकीर होना चाहिए।
* कड़ी चेतावनी: अगर अब ऐसी फर्जी मुठभेड़ें सामने आईं, तो कोर्ट अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही से पीछे नहीं हटेगा।
जब वर्दी अपनी हद भूलने लगे तो उसे कानून की लगाम याद दिलाना जरूरी है। पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो 16 गाइडलाइन्स दी थीं, वे पुलिस के लिए 'लक्ष्मण रेखा' की तरह हैं।
बेबाक 24 की खास पड़ताल में जानिए वो नियम, जो फर्जी एनकाउंटर करने वालों को सलाखों के पीछे पहुंचा सकते हैं:
एनकाउंटर की 'लक्ष्मण रेखा': सुप्रीम कोर्ट की वो 16 शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि आत्मरक्षा में गोली चलाना पुलिस का अधिकार तो है, लेकिन इसका मतलब 'लाइसेंस टू किल' नहीं है। यहाँ हैं प्रमुख गाइडलाइन्स:
* इंटेलिजेंस का रिकॉर्ड: मुठभेड़ से पहले अगर पुलिस को कोई गुप्त जानकारी (Intelligence) मिलती है, तो उसे लिखित रूप में (चाहे कोड नेम में ही सही) डायरी में दर्ज करना अनिवार्य है।
* FIR है जरूरी: एनकाउंटर के बाद बिना देरी किए धारा 154 के तहत FIR दर्ज होनी चाहिए और उसकी कॉपी तुरंत कोर्ट को भेजनी होगी।
* स्वतंत्र जांच (CID प्रोब): मुठभेड़ की जांच उसी पुलिस स्टेशन की टीम नहीं करेगी, बल्कि दूसरे पुलिस स्टेशन या CID की विशेष टीम करेगी, जिसकी निगरानी एक वरिष्ठ अधिकारी करेगा।
* मजिस्ट्रेट जांच (Magisterial Inquiry): हर एनकाउंटर केस में धारा 176 के तहत मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य है। इसकी रिपोर्ट सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) को भेजी जानी चाहिए।
* NHRC को सूचना: किसी भी एनकाउंटर में मौत होने पर तुरंत मानवाधिकार आयोग (NHRC) को सूचित करना होगा।
* मेडिकल सहायता: अगर अपराधी घायल है, तो उसे तुरंत बेहतरीन मेडिकल सहायता दी जानी चाहिए और मजिस्ट्रेट उसका बयान दर्ज करेगा।
* बिना देरी के पंचनामा: घटनास्थल की फोटोग्राफी और पंचनामा बिना किसी छेड़छाड़ के तुरंत होना चाहिए।
* परिजनों को सूचना: मुठभेड़ में मारे गए शख्स के परिवार को तुरंत आधिकारिक सूचना देना पुलिस की जिम्मेदारी है।
* हथियारों का सरेंडर: जांच के दौरान मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को अपने हथियार जांच टीम को सौंपने होंगे।
* लीगल एड: घायल अपराधी को कानूनी सहायता (वकील) पाने का पूरा अधिकार है।
* पोस्टमॉर्टम: वीडियोग्राफी के साथ दो डॉक्टरों के पैनल द्वारा सरकारी अस्पताल में ही पोस्टमॉर्टम होगा।
* त्वरित अनुशासनिक कार्रवाई: अगर जांच में मुठभेड़ फर्जी पाई जाती है, तो दोषी पुलिसकर्मियों को तुरंत सस्पेंड कर उनके खिलाफ हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।
उल्लंघन पर क्या है अंजाम?
अगर पुलिस इन 16 नियमों में से एक का भी उल्लंघन करती है, तो:
* संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा चल सकता है।
* पीड़ित परिवार को भारी मुआवजा देने का आदेश दिया जा सकता है।
* संबंधित अधिकारियों की पदोन्नति (Promotion) और वीरता पुरस्कार वापस लिए जा सकते हैं।
बेबाक नजरिया
यूपी पुलिस की 'ठोक दो' वाली छवि पर हाईकोर्ट की यह टिप्पणी एक बड़ा मोरल चेक है। अपराधियों में खौफ जरूरी है, लेकिन वह खौफ 'कानून' का होना चाहिए, 'वर्दी की मनमानी' का नहीं। जब पुलिस खुद कानून हाथ में लेने लगे, तो लोकतंत्र और तानाशाही के बीच की लकीर धुंधली पड़ जाती है।
इंसाफ की कुर्सी पर बैठकर फैसला सुनाना और सड़क पर गोली चलाकर फैसला करना—दोनों में बहुत फर्क है। हाईकोर्ट ने आज वही फर्क याद दिलाया है।
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