by on | 2026-11-06 14:49:00 Last Updated by admin@bebak24.com on
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नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़
दिल्ली-एनसीआर में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर चिंता जताई है। शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रदूषण के लिए केवल पराली जलाने को जिम्मेदार मानने के बजाय वाहनों और अन्य स्थानीय स्रोतों से निकलने वाले धुएं पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई। सुनवाई के दौरान अदालत ने विशेष रूप से संपन्न वर्ग की गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को लेकर सवाल उठाए।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। यह सुनवाई दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले में हुई।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने हल्के अंदाज में कहा कि उम्मीद है, सभी लोग दिल्ली के मौसम का आनंद ले रहे होंगे। इस पर मामले में न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने प्रदूषण की गंभीर स्थिति की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया।
उन्होंने बताया कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर गंभीर श्रेणी के आसपास बना हुआ है। स्थिति इतनी खराब है कि लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। उन्होंने प्रदूषण के प्रभाव को समझाते हुए कहा कि ऐसा महसूस होता है मानो लोग प्रतिदिन 30 सिगरेट पी रहे हों।
अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया कि हालिया बारिश के बाद दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर कुछ कम हुआ है। उन्होंने 5 नवंबर के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि उस दिन दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत थी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि दिल्ली की हवा पहले से ही प्रदूषित रहती है और पराली जलाने से स्थिति और बिगड़ जाती है। हालांकि, उन्होंने परिवहन व्यवस्था को भी क्षेत्र में प्रदूषण का एक बड़ा कारण बताया।
सुनवाई में परिवहन, ऊर्जा उत्पादन और कचरा जलाने से होने वाले प्रदूषण पर भी चिंता जताई गई। अदालत के सामने यह बात रखी गई कि समस्या के समाधान के लिए पराली के साथ-साथ स्थानीय प्रदूषण के स्रोतों पर भी प्रभावी कदम उठाने होंगे।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस समय किसान अगली फसल की बुवाई की तैयारी करते हैं। ऐसे में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है।
इस पर न्यायमित्र अपराजिता सिंह ने कहा कि किसानों को केवल पराली प्रबंधन की मशीनें उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। कई किसानों के पास इन मशीनों को चलाने के लिए ईंधन खरीदने तक के संसाधन नहीं हैं। इसके अलावा छोटे खेतों में बड़ी मशीनों का इस्तेमाल करना भी व्यावहारिक रूप से कठिन होता है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने इस दौरान अधिकारियों की ओर से पराली को एक निश्चित दर पर खरीदने के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने प्रदूषण की जिम्मेदारी केवल किसानों पर डालने के बजाय समाज के दूसरे वर्गों की भूमिका पर भी विचार करने की जरूरत बताई।
उन्होंने सवाल उठाया कि संपन्न और अमीर वर्ग के लोगों की गाड़ियों से निकलने वाले धुएं को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
अदालत की इस टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या का समाधान केवल पराली जलाने पर रोक लगाने से नहीं होगा। वाहनों से निकलने वाला धुआं और अन्य स्थानीय प्रदूषण स्रोत भी इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
दिल्ली-एनसीआर का वायु प्रदूषण किसी एक कारण का परिणाम नहीं है। पराली जलाना, वाहनों से निकलने वाला धुआं, ऊर्जा उत्पादन और कचरा जलाना सभी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी किसानों तक सीमित नहीं रखी जा सकती। किसानों को व्यावहारिक सुविधाएं देने के साथ वाहन प्रदूषण पर नियंत्रण और सभी वर्गों की जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
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