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भूटान में ग्लेशियर झील से बाढ़, भारत के सीमावर्ती इलाकों में अलर्ट

by on | 2026-10-31 12:25:28

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भूटान में ग्लेशियर झील से बाढ़, भारत के सीमावर्ती इलाकों में अलर्ट

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

भूटान में ग्लेशियर से बनी झील शिंताफू से अचानक पानी का तेज बहाव आने के बाद बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई है। उत्तर-पश्चिमी भूटान के गासा जिले में हुई इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से होने वाले खतरे की ओर फिर ध्यान खींचा है। घटना के बाद पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती इलाकों में भी सतर्कता बरती जा रही है।

शिंताफू झील मो छू नदी के उद्गम क्षेत्र में स्थित है और भूटान की 17 संभावित खतरनाक ग्लेशियर झीलों में शामिल है। इससे पहले 2021 में भी इस क्षेत्र में बाढ़ आई थी। इस घटना के संदर्भ में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी ग्लोफ का खतरा चर्चा में है।

क्या होता है ग्लोफ?

ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) ऐसी अचानक आने वाली बाढ़ है, जिसमें ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झील का पानी प्राकृतिक बांध टूटने या उसके ऊपर से बहने के कारण तेजी से बाहर निकल जाता है।

ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाला पानी पहाड़ों के बीच बने गड्ढों और निचले क्षेत्रों में जमा होने लगता है। कई बार ग्लेशियर अपने साथ लाई मिट्टी, पत्थरों और मलबे से प्राकृतिक बांध जैसा ढांचा बना देते हैं। इसके पीछे पानी जमा होकर झील का रूप ले लेता है। हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी झीलें बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

कैसे टूटते हैं प्राकृतिक बांध?

ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से झील में पानी का स्तर बढ़ सकता है। इसके अलावा आसपास की पहाड़ियों से भूस्खलन या हिमस्खलन के कारण बर्फ और बड़े पत्थर झील में गिर सकते हैं। इससे पानी में तेज लहरें उठती हैं और प्राकृतिक बांध के ऊपर से पानी बहने लगता है या बांध टूट सकता है।

इसके बाद पानी तेजी से पहाड़ों से नीचे की ओर बहता है। अपने साथ मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर आने के कारण यह बाढ़ निचले इलाकों में बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती है। ऐसी घटनाओं में लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।

हिमालय में क्यों बढ़ रहा है खतरा?

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इनके पिघलने से नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं और पहले से मौजूद झीलों का आकार भी बढ़ सकता है।

यदि इन झीलों के प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ते हैं या टूट जाते हैं, तो अचानक बाढ़ का खतरा पैदा होता है। इसका असर निचले इलाकों में रहने वाली आबादी के साथ सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर भी पड़ सकता है।

हिमालयी क्षेत्र में कितनी हैं ग्लेशियर झीलें?

नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के सर्वेक्षण के अनुसार, 2011 से 2015 के बीच सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में ग्लेशियर झीलों और अन्य जल निकायों की पहचान की गई थी। यह परियोजना केंद्रीय जल आयोग के जलवायु परिवर्तन निदेशालय के सहयोग से पूरी हुई थी।

सर्वेक्षण में दर्ज आंकड़े इस प्रकार थे:

  • सिंधु नदी घाटी: 352 झीलें और जल निकाय।

  • गंगा नदी घाटी: 283 झीलें और जल निकाय।

  • ब्रह्मपुत्र नदी घाटी: 1,393 झीलें और जल निकाय।

ये आंकड़े 2011 से 2015 के सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इनसे हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों की पहचान और लगातार निगरानी की जरूरत का पता चलता है।

ग्लोफ का खतरा कैसे कम किया जा सकता है?

ग्लेशियर झीलों से होने वाली संभावित तबाही को कम करने के लिए समय रहते खतरे की पहचान और चेतावनी व्यवस्था मजबूत करना जरूरी है।

  • उपग्रह से निगरानी: उपग्रह चित्रों के माध्यम से झीलों के आकार और उनमें होने वाले बदलावों पर नजर रखी जा सकती है।

  • रडार तकनीक का उपयोग: सिंथेटिक अपर्चर रडार तकनीक से बादलों और खराब मौसम के दौरान भी झीलों में होने वाले बदलावों की निगरानी में मदद मिल सकती है।

  • चेतावनी प्रणाली: संवेदनशील झीलों के आसपास सेंसर और समय रहते सूचना देने वाली व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

  • आपदा तैयारी: निचले इलाकों में सुरक्षित निकासी मार्ग, राहत केंद्र और नियमित अभ्यास की व्यवस्था जरूरी है।

बेबाक24 टेक

भूटान की शिंताफू झील से आई बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से जुड़े जोखिम को फिर सामने ला दिया है। जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना और झीलों में बढ़ता पानी ग्लोफ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकते हैं। ऐसे में उपग्रह निगरानी, समय पर चेतावनी और आपदा प्रबंधन की तैयारी संभावित नुकसान को कम करने में अहम भूमिका निभा सकती है।



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