by on | 2026-10-26 12:22:58
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विश्व डेस्क | बेबाक24 न्यूज़
यूरोप के कई देशों में युवाओं का असंतोष अलग-अलग मुद्दों को लेकर सड़कों पर दिखाई दे रहा है। फ्रांस, इटली, स्पेन, पुर्तगाल, बेल्जियम और अल्बानिया में विरोध प्रदर्शनों के बीच अब जर्मनी में भी 31 अक्टूबर को देशव्यापी प्रदर्शन की तैयारी है। कहीं महंगाई और रोजगार चिंता का विषय हैं, तो कहीं शिक्षा व्यवस्था, सैन्य सेवा और गाजा में जारी संघर्ष को लेकर नाराजगी सामने आ रही है।
हैलोवीन के आयोजन से पहले यूरोप के कई शहरों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़पों ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, सभी प्रदर्शन हिंसक नहीं हैं और कई जगह लोग शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें उठा रहे हैं।
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में युवा संगठनों ने 31 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है। आयोजकों के अनुसार, 21 शहरों में प्रदर्शन प्रस्तावित हैं। अभियान से जुड़े लोगों ने सोशल मीडिया पर युवाओं से इसमें शामिल होने की अपील की है।
जर्मनी में विरोध का एक प्रमुख मुद्दा सैन्य सेवा से जुड़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नए सैन्य सेवा कानून के तहत 2008 या उसके बाद जन्मे युवकों के लिए सैन्य सेवा से संबंधित प्रश्नपत्र भरना अनिवार्य किया गया है, जबकि सेवा फिलहाल स्वैच्छिक है।
युवाओं के एक वर्ग को आशंका है कि आगे चलकर सैन्य सेवा को लेकर और सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। रिपोर्ट में उद्धृत एक सर्वे के मुताबिक, 18 से 28 वर्ष के केवल 14 प्रतिशत युवा ही सेना में जाने के इच्छुक हैं।
31 अक्टूबर को हैलोवीन के आयोजन भी पुलिस के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकते हैं। पिछले वर्ष बर्लिन में हैलोवीन के दौरान हिंसा और पुलिस पर आतिशबाजी किए जाने की घटनाओं के बाद 132 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस बार पुलिस प्रदर्शनकारियों और जश्न में शामिल लोगों की गतिविधियों पर नजर रखेगी।
नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम में फलस्तीन और गाजा का मुद्दा विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में है। प्रदर्शनकारी इस्राइल सरकार की नीतियों के खिलाफ डच सरकार से सख्त रुख अपनाने की मांग करते रहे हैं।
रिपोर्ट में पिछले वर्ष एम्सटर्डम में लाल कपड़े पहनकर निकाले गए बड़े मार्च का भी उल्लेख है, जिसमें करीब 2.5 लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया गया था।
हालांकि, इस विरोध के बीच यहूदी समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों की घटनाएं भी चिंता का विषय बनी हैं। इस्राइल सरकार की नीतियों के विरोध और यहूदी लोगों के प्रति भेदभाव के बीच अंतर बनाए रखना महत्वपूर्ण है। किसी सरकार की कार्रवाई के विरोध को किसी धार्मिक समुदाय के खिलाफ नफरत में बदलना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है।
नीदरलैंड के हेग शहर में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में इस्राइल के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका की ओर से दायर मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है। दक्षिण अफ्रीका ने दिसंबर 2023 में इस्राइल पर नरसंहार संधि के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए मामला दायर किया था। इस्राइल ने आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि उसकी सैन्य कार्रवाई हमास के खिलाफ है, फलस्तीनी नागरिकों के खिलाफ नहीं।
रिपोर्ट में दी गई समय-सारणी के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका को 22 नवंबर 2027 तक और इस्राइल को 22 मई 2029 तक अपना पक्ष प्रस्तुत करना है। इस मामले में अंतिम निर्णय आने में अभी समय लग सकता है।
अदालत की कानूनी प्रक्रिया और सड़कों पर उठ रही मांगों के बीच लंबा अंतर भी युवाओं की निराशा का एक कारण बताया जा रहा है।
फ्रांस में युवाओं और श्रमिक संगठनों के प्रदर्शनों में आर्थिक स्थिति, सरकारी नीतियों और राजनीतिक नेतृत्व के प्रति असंतोष सामने आया है। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं, जबकि अन्य शहरों में मार्च शांतिपूर्ण रहे।
इटली में छात्रों ने शिक्षा के लिए अधिक धन और हथियारों पर खर्च कम करने की मांग उठाई। प्रधानमंत्री जियॉर्जिया मेलोनी की सरकार के खिलाफ भी नारेबाजी हुई।
स्पेन में बढ़ते मकान किराये, आवास की लागत और पेंशन से जुड़े मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए। पुर्तगाल में भी लोग किफायती आवास की मांग लेकर सड़कों पर उतरे। वहीं, अल्बानिया में शिक्षा व्यवस्था, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के खिलाफ छात्रों के आंदोलन के दौरान हिंसा की घटनाएं सामने आईं।
इन देशों में विरोध के कारण एक जैसे नहीं हैं, लेकिन युवाओं के भविष्य, आर्थिक दबाव और सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष कई जगह दिखाई दे रहा है।
भारत में भी अग्निपथ योजना, परीक्षा प्रश्नपत्र लीक और रोजगार की अनिश्चितता जैसे मुद्दों पर युवा विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं। हालांकि, भारत और यूरोप की परिस्थितियों की तुलना करते समय दोनों क्षेत्रों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संदर्भों को ध्यान में रखना जरूरी है।
यूरोप के विभिन्न देशों में मौजूदा विरोध सैन्य सेवा, महंगाई, शिक्षा, आवास और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष जैसे कई मुद्दों से जुड़ा है। इससे स्पष्ट होता है कि युवाओं की नाराजगी को किसी एक कारण से नहीं समझा जा सकता।
यूरोप में जारी विरोध प्रदर्शनों के पीछे अलग-अलग राष्ट्रीय परिस्थितियां हैं, लेकिन युवाओं के भविष्य, आर्थिक अवसरों और सरकारी नीतियों को लेकर असंतोष कई देशों में सामने आया है। जर्मनी में 31 अक्टूबर को प्रस्तावित प्रदर्शनों पर सुरक्षा एजेंसियों की नजर रहेगी। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारें युवाओं की मांगों पर किस तरह प्रतिक्रिया देती हैं और विरोध शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता बनता है या तनाव और बढ़ता है।
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