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पीयूष गोयल का सवाल: 100 अरब डॉलर का जलवायु वादा कहां गया?

by on | 2026-10-23 12:20:59

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पीयूष गोयल का सवाल: 100 अरब डॉलर का जलवायु वादा कहां गया?

बर्लिन | बेबाक24 न्यूज़

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकसित देशों की वित्तीय प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठाए हैं। बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक गोलमेज सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित देशों ने जलवायु संकट से प्रभावित कमजोर देशों की मदद के लिए बड़े वादे किए, लेकिन अपेक्षित सहायता को लेकर अब भी गंभीर सवाल बने हुए हैं।

गोयल के अनुसार, 2015 के पेरिस जलवायु समझौते के तहत विकसित देशों ने हर साल 100 अरब डॉलर की जलवायु सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई थी। उन्होंने कहा कि 11 साल बाद भी इस वादे को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।

विकसित देशों की जिम्मेदारी पर उठाए सवाल

पीयूष गोयल ने कहा कि औद्योगिक विकास के लंबे दौर में विकसित देशों ने बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन किया। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे आर्थिक रूप से कमजोर देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देना उनकी जिम्मेदारी है।

उन्होंने प्रशांत महासागर और कैरेबियाई क्षेत्र के उन द्वीपीय देशों का भी उल्लेख किया, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। गोयल ने कहा कि इन देशों को सहायता देने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर की गई प्रतिबद्धताओं को पूरा करना जरूरी है।

भारत के उत्सर्जन का भी किया उल्लेख

गोयल ने भारत की आबादी और कार्बन उत्सर्जन का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की लगभग 17 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसकी हिस्सेदारी 3 प्रतिशत से भी कम है।

उन्होंने यूरोप की आबादी और उत्सर्जन का हवाला देते हुए विकसित देशों की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में जिम्मेदारी और वित्तीय योगदान का बंटवारा न्यायसंगत होना चाहिए।

क्या है 100 अरब डॉलर का वादा?

जलवायु वित्त के तहत विकसित देशों ने 2009 में कोपेनहेगन जलवायु सम्मेलन के दौरान विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा था। बाद में पेरिस समझौते में भी इस वित्तीय प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया गया।

इस सहायता का उद्देश्य विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने, उत्सर्जन घटाने और स्वच्छ तकनीक अपनाने में मदद देना था। हालांकि, जलवायु वित्त की गणना में सार्वजनिक धन, निजी निवेश और विभिन्न वित्तीय माध्यमों को शामिल किए जाने के कारण इसके वास्तविक स्वरूप और पर्याप्तता पर अंतरराष्ट्रीय बहस जारी रही है।

बेबाक24 टेक

पीयूष गोयल के बयान ने जलवायु वित्त और विकसित देशों की जिम्मेदारी को लेकर चल रही बहस को फिर सामने ला दिया है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं; विकासशील और जलवायु-संवेदनशील देशों के लिए वित्तीय सहायता की उपलब्धता, पारदर्शिता और समय पर भुगतान भी अहम मुद्दे हैं।



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