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ऑक्सफोर्ड रिपोर्ट: विकास के दावों के बीच काशी की कड़वी हकीकत, आखिर कब सुधरेगी शिव की नगरी?

by admin@bebak24.com on | 2026-09-22 15:38:46

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ऑक्सफोर्ड रिपोर्ट: विकास के दावों के बीच काशी की कड़वी हकीकत, आखिर कब सुधरेगी शिव की नगरी?

​वाराणसी (विशेष प्रतिनिधि)। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की 'वैश्विक शहर सूचकांक 2026' रिपोर्ट ने जहां देश के 55 उभरते आर्थिक केंद्रों में भारतीय शहरों की चमक दिखाई है, वहीं प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र और पूर्वांचल के सबसे प्रमुख केंद्र वाराणसी की एक ऐसी तस्वीर उजागर की है, जो प्रशासनिक दावों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। दुनिया के 1,000 प्रमुख शहरों के मूल्यांकन में वाराणसी समग्र रैंकिंग में 832वें स्थान पर खिसक गया है, जबकि उत्तर प्रदेश के 15 शहरों में यह आठवें पायदान पर है। सबसे चिंताजनक पहलू पर्यावरण और जनसुविधाओं का है, जहां काशी को वैश्विक स्तर पर 952वीं रैंक मिली है—यानी दुनिया के सबसे निचले पायदानों में।

​रिपोर्ट के आंकड़े केवल कागजी नहीं हैं, बल्कि काशी की जमीनी हकीकत को बयां करते हैं। शहर की घुटती हवा, सड़कों की बदहाली, धूल के गुबार और ठप पड़ी सफाई व्यवस्था को लेकर स्थानीय जनता में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। जनता का सीधा आरोप है कि शहर की बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय जनप्रतिनिधियों का ध्यान केवल परिक्रमा और राजनीति तक सीमित रह गया है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पार्टी की छत्रछाया और आलाकमान के 'कमंडल' से निकले प्रत्याशियों को आसानी से जीत मिल जाती है। मेयर और विधायक बनने के बाद वे जनता के काम करने के बजाय शीर्ष नेताओं की चापलूसी और परिक्रमा में आतुर रहते हैं। वहीं भाजपा का मजबूत गढ़ होने के कारण जनप्रतिनिधियों में यह अति-आत्मविश्वास घर कर गया है कि टिकट मिलना ही जीत की गारंटी है, जिसके चलते चुनाव जीतने के बाद गलियों के निर्माण, सीवर और स्वच्छता की सुध लेने वाला कोई नहीं बचता।

​वाराणसी की इस दुर्दशा पर अब सीधे राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठ रहे हैं। जब सांसद स्वयं देश के प्रधानमंत्री हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हर दूसरे-तीसरे सप्ताह काशी आगमन होता है, उसके बावजूद शहर पर्यावरण और जीवन की गुणवत्ता के मामले में लगातार क्यों पिछड़ रहा है? शहर की अंदरूनी गलियों के पुनरुद्धार, सीवर, पेयजल और सड़क सुधार के लिए जब स्थानीय विधायक और नगर निगम के प्रतिनिधि समय पर ठोस प्रस्ताव तैयार करके शासन को नहीं भेजेंगे, तो विकास कार्य और बजट की मंजूरी कैसे होगी? विभागीय उदासीनता और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता के कारण काशी चमक-दमक के दावों के बीच अपने मूल स्वरूप और जनसुविधाओं के लिए तरस रही है। उल्लेखनीय है कि ऑक्सफोर्ड रिपोर्ट में शहरों को 5 पैमानों—अर्थव्यवस्था (30%), मानव पूंजी (25%), जीवन स्तर (25%), पर्यावरण (10%) और शासन (10%)—पर परखा गया है, जिसमें प्रदेश स्तर पर लखनऊ 725वें, प्रयागराज 764वें, गोरखपुर 821वें और वाराणसी 832वें स्थान पर रहा है।

बेबाक24 की राय: काशी केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी रैलियों का केंद्र नहीं है; यह करोड़ों लोगों की आस्था और लाखों नागरिकों का आशियाना है। वीआईपी दौरों, बड़े आयोजनों और चमचमाते कॉरिडोरों के बीच यदि काशी की आम जनता बदहाल सड़कों, सीवर के पानी और जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है, तो यह विकास का अधूरा और खोखला मॉडल है। जब तक जनप्रतिनिधि 'जीत की गारंटी' के अहंकार से बाहर निकलकर स्थानीय समस्याओं, गलियों के निर्माण और पर्यावरण संतुलन के लिए धरातल पर काम नहीं करेंगे, तब तक वैश्विक रिपोर्ट में काशी को यह आईना बार-बार दिखता रहेगा। काशी को परिक्रमा करने वाले नेताओं की नहीं, बल्कि धरातल पर उतरकर काम करने वाले जनप्रतिनिधियों की सख्त जरूरत है।



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