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रूस से तेल खरीदना भारत को पड़ सकता है भारी: अमेरिका में 100% टैरिफ की तैयारी, विधेयक में भारत समेत 10 देश

by admin@bebak24.com on | 2026-09-15 11:51:39

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रूस से तेल खरीदना भारत को पड़ सकता है भारी: अमेरिका में 100% टैरिफ की तैयारी, विधेयक में भारत समेत 10 देश

नई दिल्ली | बेबाक24 न्यूज़

रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका का दबाव और बढ़ सकता है। अमेरिकी सांसदों ने रूस पर प्रतिबंध से जुड़े विधेयक में संशोधन पेश किए हैं, जिनमें भारत समेत 10 प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का प्रस्ताव शामिल है। हालांकि, यह अभी प्रस्ताव के स्तर पर है और अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी के बाद ही आगे की प्रक्रिया बढ़ेगी।

भारत समेत 10 देशों के नाम जोड़ने का प्रस्ताव

डेमोक्रेटिक सांसद स्टेनी होयर की ओर से पेश संशोधन में चीन, भारत, तुर्किये, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक रिपब्लिक, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, कजाखस्तान और किर्गिज रिपब्लिक को प्रस्तावित सूची में शामिल किया गया है।

इस संशोधन के तहत रूस के साथ महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध रखने वाले इन देशों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का रास्ता तैयार करने की बात कही गई है। मामला ऐसे समय में सामने आया है जब रूस पर नए प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिकी विधेयक को प्रतिनिधि सभा से पारित कराने की समयसीमा नजदीक है।

सीनेट में भारी बहुमत से पारित हो चुका है विधेयक

‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ अमेरिकी सीनेट में 86-11 मतों से पारित हो चुका है। विधेयक में रूस के शीर्ष नेतृत्व और उसके ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंधों के साथ उन जहाजों के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रस्ताव है, जिनका इस्तेमाल प्रतिबंधों से बचकर रूसी तेल की आपूर्ति में किया जाता है।

अमेरिका का तर्क है कि रूस के तेल कारोबार से मिलने वाली आय यूक्रेन के खिलाफ जारी युद्ध को आर्थिक समर्थन देती है। इसी आधार पर रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भी दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

मौजूदा विधेयक में राष्ट्रपति को 100% टैरिफ का अधिकार

7 अगस्त को सीनेट से पारित विधेयक में भारत और चीन जैसे देशों का नाम सीधे शामिल नहीं किया गया था, लेकिन उसमें रूस के प्रमुख तेल व्यापारिक साझेदारों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है।

अब प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलने के बाद ही विधेयक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए आगे बढ़ सकेगा। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 3 नवंबर को होने हैं और उससे पहले प्रतिनिधि सभा के पास सीमित कार्यदिवस बचे हैं। ऐसे में विधेयक पर आने वाले दिनों में तेजी से राजनीतिक गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।

एक संशोधन टैरिफ प्रावधान हटाने के पक्ष में

जहां एक संशोधन रूस के साझेदार देशों की सूची स्पष्ट कर 100 प्रतिशत शुल्क का रास्ता खोलने की कोशिश करता है, वहीं डेमोक्रेटिक सांसद ग्रेगरी मीक्स ने इसका उलटा प्रस्ताव दिया है।

मीक्स ने विधेयक की धारा 113 को हटाने की मांग की है। इसी धारा में राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझेदारों पर व्यापक द्वितीयक शुल्क लगाने का अधिकार देने की बात है। उनके प्रस्ताव को तीन अन्य सांसदों का समर्थन भी मिला है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर छूट का भी प्रस्ताव

मीक्स ने एक अन्य संशोधन के जरिए राष्ट्रपति को किसी विदेशी व्यक्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों से 90 दिनों की छूट देने का अधिकार देने का प्रस्ताव रखा है। जरूरत पड़ने पर इस अवधि को 90-90 दिनों के लिए बढ़ाने की व्यवस्था की बात कही गई है, बशर्ते इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जाए।

इसके अलावा यूक्रेन को 15 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष ऋण उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है। इस धन का इस्तेमाल रक्षा उपकरण और सेवाओं की खरीद के लिए किया जा सकेगा।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

अमेरिकी प्रस्ताव भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि रूस भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। यदि 100 प्रतिशत द्वितीयक शुल्क वाला प्रावधान वास्तव में लागू होता है, तो रूस से ऊर्जा आयात से जुड़े भारतीय व्यापार पर अमेरिकी बाजार और कंपनियों के स्तर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पर निश्चित रूप से 100 प्रतिशत शुल्क लगेगा। फिलहाल यह अमेरिकी सांसदों द्वारा पेश संशोधनों और विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका अंतिम स्वरूप प्रतिनिधि सभा और आगे की अमेरिकी राजनीतिक प्रक्रिया तय करेगी।

बेबाक24 टेक: रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका का दबाव अब केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं दिख रहा। प्रस्तावित 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हुआ तो भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, आयात लागत और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध—तीनों के बीच संतुलन साधना बड़ी चुनौती होगी। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव कानून बनता है या अमेरिकी संसद में राजनीतिक विरोध के कारण इसका स्वरूप बदल जाता है।



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