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संविधान की धज्जियां और सरकार के बहाने: UP पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट का करारा चाबुक

by on | 2026-08-06 21:10:23

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संविधान की धज्जियां और सरकार के बहाने: UP पंचायत चुनाव पर हाईकोर्ट का करारा चाबुक


वाराणसी । ​लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन सबसे बुनियादी इकाई—ग्राम पंचायत—को कागजी उलझनों और सरकारी ढिलाई की बलि चढ़ा दिया गया है। जब संवैधानिक मियाद 26 मई 2026 को ही दम तोड़ चुकी थी, तो फिर चुनाव कराने में इतनी हीला-हवाली क्यों? इसी तीखे सवाल के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार की कमान कस दी है और साफ लहजे में कह दिया है—रिकॉर्ड लाओ, अदालत तय करेगी कि यह देरी किसी वाकई मजबूरी का नतीजा थी या फिर प्रशासनिक लापरवाही का खेल!

​बहानों की फेहरिस्त vs संविधान की मर्यादा

अदालत में सरकार ने देरी के पीछे दो बड़े ‘तर्क’ चिपकाए—पहला, समर्पित पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग का गठन और उसकी सिफारिशों के आधार पर आरक्षण तय करने की लंबी प्रक्रिया। दूसरा, राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के प्रकाशन की तारीख को 10 जून 2026 तक खींचना।

​लेकिन सवाल यह है कि जब पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल मई 2026 में खत्म होना तय था, तो मई 2025 से शुरू हुई कागजी फाइलें इतने महीनों तक ठंडे बस्ते में क्यों रेंगती रहीं? जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ ने इस रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए रिकॉर्ड तलब कर लिए हैं। अदालत अब ई-अभिलेखों (डिजिटल रिकॉर्ड्स) का बारीक मुआयना करेगी ताकि सच सामने आ सके। कोर्ट ने सरकार को आइना दिखाते हुए साफ कहा कि भविष्य में ऐसी नौबत न आए, इसके लिए पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने से कम से कम दो साल पहले चुनावी तैयारियां शुरू हो जानी चाहिए। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक सुरेश महाजन फैसले को दोबारा पढ़ने की नसीहत भी दे डाली।

​प्रशासकों का राज: लोकतंत्र पर सीधा प्रहार?

जनहित याचिका में एक और बेहद चुभता हुआ संवैधानिक सवाल उठाया गया है। कार्यकाल खत्म होने के बाद निर्वाचित ग्राम प्रधानों को हटाकर उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम की धारा 12(3-ए) के तहत 'प्रशासक' (Administrators) बैठा देना, क्या संविधान के अनुच्छेद 243-ई की आत्मा की हत्या नहीं है? जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की जगह अफसरों के हाथ में गांव की सत्ता सौंप देना लोकतंत्र के ढांचे को ही कमजोर करता है।

​अब 11 अगस्त की तारीख मुकर्रर है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली की खंडपीठ के सामने सरकार को अपने दिए गए हलफनामे पर बिंदुवार जवाब देना होगा। देखना यह होगा कि कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद सरकार संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए कितनी फुर्ती दिखाती है, या फिर तारीख-पर-तारीख का सिलसिला जारी रहता है।



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