by on | 2026-07-17 21:00:00
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बेंगलुरु/नई दिल्ली (बेबाक२४): भारत के तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र (स्पेस स्टार्टअप्स) के आकर्षण ने देश की सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को एक अभूतपूर्व संकट में डाल दिया है। पिछले एक वर्ष में संगठन के लगभग 100 से 120 वरिष्ठ वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा सरकारी नौकरी छोड़ निजी स्पेस स्टार्टअप्स का रुख करने के बाद, अब केंद्र सरकार के अंतरिक्ष विभाग ने इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) से जुड़े नियमों में तत्काल प्रभाव से कड़ा बदलाव किया है।
अंतरिक्ष विभाग द्वारा जारी नए कार्यालय ज्ञापन (ऑफिस मेमोरेंडम) के अनुसार, महत्वपूर्ण परियोजनाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासनिक नियंत्रण को कड़ा किया गया है:
विकेंद्रीकरण समाप्त: अब तक इसरो के विभिन्न केंद्रों के निदेशकों या यूनिट प्रमुखों के पास अपने स्तर पर इस्तीफे स्वीकार करने का अधिकार था, जिसे अब वापस ले लिया गया है।
संस्तुति की नई प्रणाली: अब 'साइंटिस्ट/इंजीनियर-एसजी' रैंक से नीचे के अधिकारियों के मामलों में भी संबंधित केंद्र के निदेशक केवल अपनी स्पष्ट सिफारिशों के साथ प्रस्ताव को मुख्य विभाग (अंतरिक्ष विभाग) को भेजेंगे, जहां अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
परियोजनाओं की सुरक्षा: यह कदम विशेष रूप से गगनयान और अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अंतरिक्ष अभियानों से जुड़े ग्रुप 'ए' के वैज्ञानिकों तथा उच्च तकनीकी कर्मियों पर लागू होगा।
इसरो छोड़ने वाले वैज्ञानिकों की बढ़ती संख्या के पीछे कई नीतिगत, आर्थिक और ढांचागत कारण सामने आ रहे हैं:
पूर्व वैज्ञानिक सचिव पी.जी. दिवाकर के अनुसार, इसरो की कार्यप्रणाली में बदलाव आया है। पहले सरकार सीधे सामाजिक हित के उपग्रहों (जैसे रिसोर्ससैट, कार्टोसैट) के लिए इसरो को सीधे बजट देती थी। अब नीतिगत बदलाव के तहत अलग-अलग सरकारी मंत्रालयों को अपनी आवश्यकता के अनुसार स्वतंत्र रूप से उपग्रह लॉन्च करने को कहा गया है। इस बदलाव के कारण इसरो के वैज्ञानिकों को वर्तमान में निजी क्षेत्र अधिक आकर्षक और सक्रिय विकल्प लग रहा है।
पूर्व इसरो अध्यक्ष जी. माधवन नायर ने रेखांकित किया है कि पूर्ववर्ती सरकारों के समय अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे जटिल क्षेत्रों के लिए विशेष प्रोत्साहन, प्रदर्शन आधारित इनाम और अतिरिक्त वेतन वृद्धि जैसी योजनाएं लागू की गई थीं, जिन्हें समय के साथ धीरे-धीरे वापस ले लिया गया। निजी क्षेत्र और सरकारी वेतन के बीच का यह बड़ा अंतर प्रतिभाओं के पलायन का मुख्य कारण बन रहा है।
इस पलायन का सबसे बड़ा उदाहरण विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएससी) के लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम-3) के परियोजना निदेशक विक्टर जोसेफ का स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेना है। इसके अतिरिक्त, सबसे अधिक वैज्ञानिक यूआर राव सैटेलाइट सेंटर से अलग हुए हैं।
अंतरिक्ष क्षेत्र को वर्ष २०१९ में 'इन-स्पेस' के गठन के साथ निजी भागीदारी के लिए खोले जाने के बाद देश में स्पेस इकॉनमी का ढांचा पूरी तरह बदल चुका है:
संख्या और निवेश: वर्तमान में देश में लगभग 399 स्पेस स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं, जो लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण, प्रणोदन प्रणाली (प्रोपल्शन) और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
प्रमुख कंपनियां: पिक्सेल, स्काईरूट, अग्निकुल और गैलेक्सआई जैसी स्वदेशी कंपनियां तेजी से विदेशी निवेश को आकर्षित कर रही हैं।
बाजार का आकार: केंद्रीय अंतरिक्ष मंत्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, भारत की स्पेस इकॉनमी का आकार बढ़कर अब 8.4 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
| विवरण का पैमाना | वर्तमान स्थिति और चुनौतियां |
| पलायन की दर | पिछले एक वर्ष में अनुमानित १०० से १२० वैज्ञानिक निजी स्टार्टअप्स में शामिल हुए। |
| नया इस्तीफा नियम | अब केंद्र निदेशकों के पास अधिकार नहीं; केवल अंतरिक्ष विभाग का निर्णय ही मान्य होगा। |
| आर्थिक प्रोत्साहन | सरकारी वेतन और निजी पैकेजों में भारी अंतर; पुरानी प्रोत्साहन नीतियां निष्क्रिय। |
| निजी क्षेत्र का प्रभाव | ३९९ सक्रिय स्टार्टअप्स के साथ भारत की स्पेस इकॉनमी का मूल्य ८.४ अरब डॉलर हुआ। |
इसरो जैसी ऐतिहासिक और विश्व स्तर पर प्रशंसित संस्था से वैज्ञानिकों का इस प्रकार निजी कंपनियों की ओर जाना एक दोधारी तलवार की तरह है। एक ओर जहां यह देश के भीतर एक मजबूत और आत्मनिर्भर निजी अंतरिक्ष उद्योग के खड़े होने का संकेत है, वहीं दूसरी ओर यह इसरो की गगनयान जैसी अत्यंत संवेदनशील और महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की गति को प्रभावित कर सकता है।
बेबाक24 का मानना है कि केवल इस्तीफे के नियमों को प्रशासनिक रूप से जटिल बना देने से वैज्ञानिकों का पलायन रोकना एक अल्पकालिक समाधान मात्र है। यदि सरकार चाहती है कि देश के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क इसरो में बने रहें, तो उसे प्रतिबंधात्मक नीतियों के बजाय रचनात्मक प्रोत्साहन प्रणालियों को फिर से बहाल करना होगा। वैज्ञानिकों को केवल कड़े नियमों से बांधने के बजाय उन्हें अत्यधिक चुनौतीपूर्ण शोध वातावरण, बेहतर वित्तीय सुरक्षा और उनके असाधारण कार्यों के लिए विशेष प्रोत्साहन देना ही इस समस्या का एकमात्र व्यावहारिक और दीर्घकालिक समाधान है।
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