by on | 2026-07-17 20:38:48
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नई दिल्ली (बेबाक२४): प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के विरोध और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पिछले २० दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर बेमियादी भूख हड़ताल पर बैठे हैं। २८ जून से केवल नमक-पानी के सहारे अनशन कर रहे वांगचुक की बिगड़ती सेहत के बावजूद केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, इस आंदोलन और भूख हड़ताल की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में तेजी से सुनाई दे रही है।
इस आंदोलन की शुरुआत प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ छात्र हितों की रक्षा के लिए अभिजीत दीपके (बोस्टन यूनिवर्सिटी के छात्र) द्वारा गठित 'कॉकरोच जनता पार्टी' के बैनर तले हुई थी:
नामकरण की वजह: इस अनोखे नाम की शुरुआत देश की सर्वोच्च अदालत की एक टिप्पणी के बाद विरोध स्वरूप हुई थी, जिसमें कथित तौर पर बेरोजगार युवाओं की तुलना एक संदर्भ में कॉकरोच से की गई थी। हालांकि, बाद में इस टिप्पणी पर स्पष्टीकरण भी आया था।
वांगचुक का जुड़ाव: शिक्षा सुधारों के लिए ४० वर्षों से संघर्ष कर रहे सोनम वांगचुक २८ जून को इस आंदोलन में शामिल हुए। उनका कहना है कि युवाओं की इस स्वतःस्फूर्त आवाज को दबाया नहीं जा सकता और वे इस न्याय की लड़ाई में छात्रों के साथ खड़े हैं।
विश्व के प्रमुख समाचार माध्यमों ने जंतर-मंतर पर जारी इस अनशन और भारत की परीक्षा प्रणाली की स्थिति पर अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की हैं:
अमेरिकी समाचार पत्र ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि लाखों छात्रों के न्याय की मांग कर रहे युवाओं के इस आंदोलन को सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से एक नई और मजबूत गति मिली है। अखबार को दिए साक्षात्कार में वांगचुक ने कहा कि जब जनता जागरूक होती है, तो सरकारों को जनमत की परवाह करनी ही पड़ती है।
इस समाचार पत्र ने जंतर-मंतर पर खुले आसमान के नीचे रात बिता रहे छात्रों और भूख हड़ताल के कारण कमजोर हो चुके वांगचुक की शारीरिक स्थिति का सजीव चित्रण किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अनशनकारी बेहद शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
ब्रिटिश समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय की दो जजों की पीठ ने वांगचुक की गिरती सेहत को देखते हुए अधिकारियों को डॉक्टरों की सलाह पर आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। यदि स्थिति गंभीर होती है, तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है।
इस समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया है कि वर्तमान सरकार ने अब तक आंदोलनकारियों से कोई सीधी बातचीत शुरू नहीं की है। रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा मंत्रालय की ओर से इस विषय पर पूछे गए प्रश्नों का कोई जवाब नहीं मिला है।
अमेरिका स्थित भारतीय प्रवासियों के प्रमुख संगठन 'हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स' ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र जारी किया है:
वार्ता की अपील: संगठन की कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ ने कहा है कि सरकार को अपनी चुप्पी तोड़ते हुए तुरंत प्रदर्शनकारियों से मिलना चाहिए और परीक्षा प्रणाली की प्रशासनिक विफलताओं पर ठोस जवाब देना चाहिए।
दमन का विरोध: पत्र में देश के विभिन्न हिस्सों (दिल्ली, जयपुर, कुरुक्षेत्र) में प्रदर्शनकारी छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और हिरासत की घटनाओं पर भी चिंता जताई गई है।
| आंदोलन के प्रमुख पहलू | वर्तमान स्थिति (१७ जुलाई २०२६) |
| अनशन की अवधि | २० दिन पूरे (२८ जून से निरंतर जारी) |
| शारीरिक स्थिति | वजन लगभग नौ किलोग्राम कम हुआ, डॉक्टर लगातार निगरानी कर रहे हैं। |
| मुख्य मांग | परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। |
| न्यायालय का निर्देश | दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा स्वास्थ्य की सख्त निगरानी रखने का आदेश। |
| आगामी कार्यक्रम | २० जुलाई को संसद तक विशाल मार्च निकालने का प्रस्ताव। |
लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ी परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता की मांग को लेकर चल रहा यह अनशन केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है। सोनम वांगचुक जैसे सम्मानित शिक्षा सुधारक का लगातार गिरता स्वास्थ्य और इस पर बनी हुई प्रशासनिक उदासीनता चिंताजनक है।
बेबाक२४ का मानना है कि परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग कर रहे छात्रों की चिंताओं को "अराजक तत्वों की बी-टीम" कहकर खारिज करना इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और संवाद ही सबसे बड़े हथियार हैं। २० जुलाई को संसद तक होने वाले प्रस्तावित मार्च से पहले सरकार को चाहिए कि वह आंदोलनकारियों से बातचीत की मेज पर मिले, ताकि किसी अनहोनी से बचा जा सके और छात्रों का देश की संस्थाओं पर भरोसा बहाल हो सके।
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