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खेल जगत (बेबाक24): फीफा वर्ल्ड कप में अमेरिका की शर्मनाक हार; बेल्जियम ने 4-1 से रौंदा, ट्रंप की 'पर्दे के पीछे की कूटनीति' भी नहीं आई काम

by on | 2026-07-07 19:34:12

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खेल जगत (बेबाक24): फीफा वर्ल्ड कप में अमेरिका की शर्मनाक हार; बेल्जियम ने 4-1 से रौंदा, ट्रंप की 'पर्दे के पीछे की कूटनीति' भी नहीं आई काम

डलास/स्पोर्ट्स डेस्क (बेबाक24): फीफा वर्ल्ड कप (FIFA World Cup 2026) के प्री-क्वार्टर फाइनल से अमेरिका के लिए एक बेहद निराशाजनक खबर सामने आ रही है। क्रिस्टियानो रोनाल्डो की पुर्तगाल के बाद अब मेजबान अमेरिका भी टूर्नामेंट से बाहर हो गया है। एकतरफा चले इस नॉकआउट मुकाबले में बेल्जियम ने अमेरिका को 4-1 से करारी शिकस्त देकर क्वार्टर फाइनल में शान से प्रवेश कर लिया है।

यह मैच न केवल मैदान पर बेल्जियम के आक्रामक खेल, बल्कि मैदान के बाहर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फीफा (FIFA) के बीच हुई एक बड़ी कूटनीतिक हलचल को लेकर भी इतिहास में दर्ज हो गया है।

1. बेल्जियम का चौतरफा हमला: डी केटेलारे और लुकाकू का कहर

मैच की शुरुआत से ही बेल्जियम ने अमेरिकी डिफेंस की कमजोरियों को उजागर करना शुरू कर दिया था:

  • शुरुआती बढ़त: बेल्जियम के स्टार खिलाड़ी चार्ल्स डी केटेलारे ने शानदार खेल दिखाते हुए शुरुआती दो गोल दागकर अमेरिका को बैकफुट पर धकेल दिया।

  • डिफेंस की बड़ी चूक: अमेरिकी रक्षा पंक्ति (Defense Line) की एक बड़ी और गंभीर गलती का फायदा उठाते हुए हांस वानाकेन ने बेल्जियम के लिए तीसरा गोल दागकर स्कोर 3-0 कर दिया।

  • लुकाकू ने लगाई मुहर: मैच के आखिरी पलों में दिग्गज स्ट्राइकर रोमेलू लुकाकू ने कोई ढिलाई नहीं दिखाई और बेल्जियम के लिए चौथा गोल दागकर अमेरिका की वापसी के सारे रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए।

अमेरिका का एकमात्र संघर्ष: पूरे मैच में अमेरिका की ओर से एकमात्र गोल पहले हाफ में मलिक टिलमैन ने किया, लेकिन वह टीम को शर्मनाक हार से बचाने के लिए नाकाफी था।

2. फोलारिन बालोगुन विवाद: ट्रंप के दखल पर फीफा का चौंकाने वाला फैसला

इस मैच के नतीजे से ज्यादा चर्चा अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन को लेकर थी, जो रेड कार्ड मिलने के बावजूद इस मुकाबले में खेलने उतरे थे। इस पूरे घटनाक्रम ने फुटबॉल जगत में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है:

  • रेड कार्ड का मामला: 25 वर्षीय बालोगुन को पिछले दौर के मैच में बोस्निया-हर्जेगोविना के डिफेंडर तारिक मुहारेमोविक पर खतरनाक फाउल करने के लिए सीधा रेड कार्ड दिखाया गया था। नियम के मुताबिक, उन्हें बेल्जियम के खिलाफ इस अंतिम-16 (प्री-क्वार्टर फाइनल) मुकाबले से बाहर रहना था।

  • डोनाल्ड ट्रंप का कूटनीतिक दखल: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बात की पुष्टि की है कि उन्होंने फुटबॉल की वैश्विक गवर्निंग बॉडी 'फीफा' से सीधे बात की थी और अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन पर लगाए गए एक मैच के प्रतिबंध (बैन) की समीक्षा (रिव्यू) करने का आग्रह किया था।

  • फीफा का यू-टर्न: राष्ट्रपति ट्रंप के दखल के बाद फीफा ने एक अभूतपूर्व और चौंकाने वाला फैसला लेते हुए बालोगुन के एक मैच के प्रतिबंध को 12 महीने के लिए निलंबित (Suspend) कर दिया, जिससे वे बेल्जियम के खिलाफ खेलने के लिए योग्य हो गए।

3. वैश्विक फुटबॉल संघों में भारी नाराजगी

फीफा द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति के राजनीतिक दबाव में आकर नियम बदलने के इस फैसले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना हो रही है। यूरोपीय फुटबॉल संघों की संस्था यूईएफए (UEFA), खुद बेल्जियम फुटबॉल संघ और इंग्लैंड के फुटबॉल संघों ने फीफा के इस रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की है। खेल विश्लेषकों का मानना है कि किसी देश के राष्ट्रप्रमुख के कहने पर रेड कार्ड के नियम को बदल देना खेल की निष्पक्षता पर एक बड़ा दाग है।

बेबाक24 टेक

यह मुकाबला साबित करता है कि खेल के मैदान पर केवल 'पॉलिटिकल पावर' या कूटनीतिक रसूख से मैच नहीं जीते जा सकते। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करके फीफा को झुका दिया और फोलारिन बालोगुन को मैदान पर उतारने में कामयाबी हासिल कर ली, लेकिन वे बेल्जियम के खिलाड़ियों के पैरों की रफ्तार और कूटनीतिक खेल को नहीं रोक पाए। फीफा का यह फैसला बेहद शर्मनाक है और यह दिखाता है कि खेल की संस्थाएं भी शक्तिशाली देशों के दबाव के आगे कैसे घुटने टेक देती हैं।

'बेबाक24' का मानना है कि अमेरिका की यह 4-1 की करारी हार एक तरह से कर्मा (Karma) का न्याय है। जिस खिलाड़ी (बालोगुन) को कायदे से सस्पेंड होना चाहिए था, उसे कूटनीति के दम पर टीम में शामिल तो कर लिया गया, लेकिन बेल्जियम के चार्ल्स डी केटेलारे और रोमेलू लुकाकू ने अमेरिकी डिफेंस की धज्जियां उड़ाकर यह साफ कर दिया कि फुटबॉल की ट्रॉफी रीलों और पैरवी से नहीं, बल्कि मैदान पर पसीना बहाने से जीती जाती है। फीफा को अपनी साख बचाने के लिए इस तरह के राजनीतिक हस्तक्षेपों से दूरी बनानी होगी।



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