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ASI ने सुधारी सदियों पुरानी भूल, बाबू जगत सिंह को मिला उनका हक!

by on | 2026-03-09 20:09:38

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ASI ने सुधारी सदियों पुरानी भूल, बाबू जगत सिंह को मिला उनका हक!

वाराणसी (सारनाथ): कहते हैं कि सच को दबाया जा सकता है, लेकिन मिटाया नहीं जा सकता। काशी के सारनाथ के इतिहास को लेकर जो 'अंधेरा' फैला था, उसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक झटके में साफ कर दिया है। सालों तक फाइलों में दबे रहने के बाद आखिरकार ASI ने यह आधिकारिक मुहर लगा दी है कि सारनाथ की खुदाई और इसके पुरातात्विक वैभव को दुनिया के सामने लाने वाले पहले व्यक्ति कोई अंग्रेज नहीं, बल्कि बाबू जगत सिंह थे।

शिलापट्ट बदला, अब इतिहास भी बदलेगा!

​सारनाथ के धर्मराजिका स्तूप के पास अब नजारा बदल चुका है। बरसों पुराना वह 'शिलापट्ट' (Inscription) हटा दिया गया है, जो इस ऐतिहासिक सत्य को छिपाए बैठा था। अब वहां नया बोर्ड शान से खड़ा है, जो चीख-चीख कर कह रहा है कि 18वीं शताब्दी के अंत में बाबू जगत सिंह ने ही सबसे पहले इस जगह की अहमियत को पहचाना था।

वंशजों की 'जंग' लाई रंग

​यह जीत महज कागजी नहीं है, बल्कि 'जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति' के सालों के संघर्ष का नतीजा है। बाबू जगत सिंह के छठे वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने किसी योद्धा की तरह ऐतिहासिक दस्तावेजों और साक्ष्यों की लड़ाई लड़ी। जब ASI के सामने अकाट्य प्रमाण रखे गए, तो विभाग को भी झुकना पड़ा और अपनी गलती माननी पड़ी।

बेबाक टिप्पणी: "यह सिर्फ एक पत्थर बदलना नहीं है, बल्कि उस मानसिकता पर चोट है जिसने भारतीय विद्वानों और रईसों के योगदान को हमेशा हाशिए पर रखा।"


अधिकारियों ने क्या कहा?

​ASI के डायरेक्टर हेमासागर ए. नायक ने आधिकारिक तौर पर पत्र जारी कर सारनाथ के सुपरिंटेंडेंट आर्कियोलॉजिस्ट को इस बदलाव के निर्देश दिए। काशी के विद्वानों और शोधकर्ताओं की मानें तो यह फैसला आने वाली पीढ़ियों को सारनाथ का सही इतिहास पढ़ाएगा।



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