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हक की आवाज, बेखौफ अंदाज

by on | 2026-02-02 01:27:06

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हक की आवाज, बेखौफ अंदाज

जयपुर | ब्यूरो रिपोर्ट

​राजस्थान की धरती पर इंकलाब की गूंज एक बार फिर सुनाई दे रही है। जयपुर की सड़कें आज सिर्फ ट्रैफिक से नहीं, बल्कि छात्रों के आक्रोश से भरी हुई थीं। UGC के नए नियमों के खिलाफ जो चिंगारी सुलगी थी, उसने आज मशाल का रूप ले लिया। लेकिन यह सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं है—जयपुर की गलियां गवाह बन रही हैं कि जब-जब सत्ता की नीतियां जनता की उम्मीदों पर कैंची चलाती हैं, तब-तब जन-आंदोलनों का सैलाब सड़कों पर उतरता है।

इतिहास दोहरा रहा है खुद को: किसान, युवा और अब छात्र

​आज का यह मंजर दिल्ली की सीमाओं पर हुए किसान आंदोलन की याद दिलाता है, जहाँ अन्नदाता ने काले कानूनों के खिलाफ घुटने नहीं टेके थे। ठीक उसी तर्ज पर, राजस्थान का युवा अब अपनी 'कलम' और 'किताब' को बचाने के लिए मैदान में है। यह आक्रोश वैसा ही है जैसा हमने अग्निवीर योजना के विरोध में देखा था, जहाँ भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं को सड़कों पर खड़ा कर दिया था।

आंदोलनों का मेल:

  • किसान आंदोलन: जिस तरह की बैरिकेडिंग और पुलिसिया सख्ती वहां थी, आज जयपुर में भी पुलिस ने छात्रों को 'दुश्मन' की तरह रोकने की कोशिश की।
  • बेरोजगारों का महापंचायत: हाल के महीनों में पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं को लेकर जो गुस्सा राजस्थान के युवाओं में था, वही गुस्सा आज UGC के नए नियमों के खिलाफ फूट पड़ा है।

जयपुर बना कुरुक्षेत्र: पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने

​सचिवालय कूच के दौरान जयपुर का जेएलएन मार्ग (JLN Marg) रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। पुलिस ने जब लाठियां भांजी और पानी की बौछारें करने की धमकी दी, तो छात्रों ने भी सीना तान दिया।

बेबाक आंखों देखी: "तस्वीरें डराने वाली हैं। एक तरफ हाथ में तिरंगा और किताबें लिए भविष्य के निर्माता हैं, तो दूसरी तरफ खाकी की वो दीवार जो व्यवस्था को बचाने के लिए अपनों पर ही बल प्रयोग कर रही है।"


  • खींचतान और बवाल: धक्का-मुक्की में कई छात्रों के कपड़े फटे, तो कई के पैरों में चोटें आईं।
  • जबरन गिरफ्तारी: छात्र नेताओं को घसीटकर पुलिस वैन में डाला गया, बिल्कुल वैसे ही जैसे जेएनयू (JNU) या जामिया के विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुर्खियां बनी थीं।

व्यवस्था पर बेबाक सवाल

​आखिर सरकारें संवाद की मेज सजाने से पहले पुलिस की लाठियां क्यों सजाती हैं? क्या हर विरोध को 'बगावत' का नाम देना ही लोकतंत्र है?

विरोध की साझा वजहें:

  1. कॉरपोरेट का साया: जैसे किसानों को डर था कि खेती मंडी के हाथों बिक जाएगी, वैसे ही छात्रों को डर है कि शिक्षा अब शोरूम की वस्तु बन जाएगी।
  2. स्वायत्तता पर हमला: संस्थानों को आजाद करने के नाम पर उन्हें उनके हाल पर छोड़ना (Self-financing) युवाओं को रास नहीं आ रहा।

हुंकार: "अभी तो यह अंगड़ाई है..."

​छात्र संगठनों ने दो-टूक कह दिया है कि अगर दमनकारी नीतियां वापस नहीं हुईं, तो यह आंदोलन 'चक्का जाम' के साथ-साथ दिल्ली कूच की ओर बढ़ेगा। राजस्थान की यह आग अब देशव्यापी होने की राह पर है।



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