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100 करोड़ के DMF फंड में 'बंदरबांट'! लखनऊ तक गूंजी भ्रष्टाचार की गूँज

by on | 2026-02-21 21:40:21

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100 करोड़ के DMF फंड में 'बंदरबांट'! लखनऊ तक गूंजी भ्रष्टाचार की गूँज

सोनभद्र। कोयले की कालिख और पसीने की कमाई से जमा हुए 100 करोड़ के DMF (डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड) पर भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है। जिस पैसे से खनन प्रभावित इलाकों के गरीब मजदूरों की तकदीर बदलनी थी, आरोप है कि साहबों ने उसे अपनी मनमानी की भेंट चढ़ा दिया। लेकिन अब कुर्सी बचाने की जद्दोजहद शुरू होने वाली है, क्योंकि इस महाघोटाले की फाइल सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के टेबल पर खुल गई है।

सत्ता के गलियारों में हलचल, जांच के आदेश!

​राष्ट्रीय लोकदल की जिला इकाई द्वारा की गई इस साहसिक शिकायत ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। मुख्यमंत्री कार्यालय के अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी सोनभद्र को 'दूध का दूध और पानी का पानी' करने का अल्टीमेटम दे दिया है। अब जांच का हंटर चलेगा और देखा जाएगा कि आखिर वो 100 करोड़ रुपये किन 'खास' जेबों में समा गए।

मजदूरों का हक और साहबों की 'ऐश'

​रालोद जिला अध्यक्ष और उनकी टीम ने सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि:

  • हक की डकैती: DMF फंड का इस्तेमाल उन मजदूरों और मूल निवासियों के लिए होना था जो प्रदूषण और खनन की मार झेल रहे हैं, लेकिन प्रशासन ने उसे 'हवा' में उड़ा दिया।
  • भारी अनियमितता: फंड के आवंटन में भारी बंदरबांट और नियमों की धज्जियाँ उड़ाने के गंभीर आरोप हैं।
  • मनमानी का खेल: फैक्ट्री वर्कर्स और प्रभावित गांवों को दरकिनार कर धन का उपयोग कागजी योजनाओं और रसूखदारों के इशारे पर किया गया।
  • "साहब, ये गरीबों के खून-पसीने का पैसा है, किसी की जागीर नहीं। अगर निष्पक्ष जांच हुई तो कई सफेदपोशों और बड़े चेहरों का बेनकाब होना तय है।" — 'दो बेबाक 24' की जमीनी पड़ताल।


    जांच के आदेश से हड़कंप

    ​रालोद जिला प्रवक्ता विकास पांडेय ने बताया कि संगठन महासचिव पवन शुक्ला, जिला उपाध्यक्ष चंद्रशेखर विश्वकर्मा और अन्य पदाधिकारियों की इस लड़ाई ने अब रंग दिखाया है। जांच के आदेश का स्वागत करते हुए संगठन ने साफ कर दिया है कि जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलेगी, संघर्ष जारी रहेगा।

    ​प्रशासन अब जांच की रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजेगा। 'खबर दो बेबाक 24' की नजर इस पूरी जांच प्रक्रिया पर बनी रहेगी। क्या वाकई गरीबों को उनका हक मिलेगा या जांच की फाइलें भी किसी रद्दी के ढेर में दब जाएंगी? यह बड़ा सवाल है।



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