by on | 2026-02-03 22:55:38
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वाराणसी | बेबाक डेस्क काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में बुधवार को सामाजिक न्याय के नाम पर जो 'हुंकार' भरी गई, उसके पीछे की पटकथा पिछले कई दिनों से कैंपस के बाहर 'सीर गेट' पर लिखी जा रही थी। कहने को तो यह मार्च UGC नियमों के समर्थन में 400 छात्रों का सैलाब था, लेकिन चश्मदीदों की मानें तो इस 'नीले' मार्च में 'लाल' रंग का गहरा साया साफ दिखाई दिया।
दिखावा दलितों का, दम भर रही सपा!
कैंपस के गलियारों में चर्चा है कि यह प्रदर्शन महज छात्रों का स्वतः स्फूर्त आंदोलन नहीं था। पिछले कई दिनों से समाजवादी पार्टी के नेताओं की कैंपस और सीर गेट पर बढ़ती सक्रियता ने इस मार्च के असली मकसद पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। हैरानी की बात यह रही कि जिन (SC/ST) के अधिकारों के नाम पर 'जय भीम' के नारे लगाए जा रहे थे, मार्च में उनकी वास्तविक संख्या नगण्य दिखी। साफ है कि पिछड़ों की राजनीति का दावा करने वाली ताकतें दलित कंधों पर बंदूक रखकर अपना सियासी निशाना साधने की फिराक में हैं।
UGC नियमों की आड़ में 'जातिगत' घेरेबंदी? विश्वनाथ मंदिर से शुरू हुए 3 किलोमीटर लंबे मार्च में थोराट कमेटी और IIT दिल्ली की स्टडी के पन्ने तो लहराए गए, लेकिन पीछे से ओबीसी हितों की बात करने वाले सपाई रणनीतिकारों ने पूरी कमान संभाल रखी थी। एकता मंच की मांगें—जैसे EOC का गठन और वेबसाइट पर डेटा सार्वजनिक करना—भले ही जायज लगें, लेकिन जिस तरह से इस आंदोलन को राजनीतिक रंग दिया गया है, उसने इसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
छावनी बना कैंपस: सुरक्षा या शक्ति प्रदर्शन?
थानों की फोर्स, RPF और RRF की तैनाती ने कैंपस को किसी युद्ध क्षेत्र जैसा अहसास कराया। प्रशासन अलर्ट था, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था छात्रों के डर से थी या उन बाहरी तत्वों के प्रवेश को रोकने के लिए, जो 'छात्र राजनीति' के बहाने कैंपस की शांति भंग करने की फिराक में हैं?
बेबाक नजरिया: शिक्षा के मंदिर में सामाजिक न्याय की मांग स्वागत योग्य है, लेकिन जब "मेरिट" और "भेदभाव" की लड़ाई में राजनीतिक दल घुसपैठ करने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि निशाना सुधार नहीं, बल्कि सत्ता का समीकरण है। दलितों की कम मौजूदगी और सपा नेताओं की 'अति-सक्रियता' चीख-चीख कर कह रही है कि यह मार्च केवल UGC के लिए नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों के लिए 'ग्राउंड' तैयार करने की कवायद थी।
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