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अन्नदाता परेशान, सिस्टम मेहरबान! लक्ष्य बढ़ा पर तौल का 'पेंच' बरकरार, पूर्व विधायक ने केंद्र पर ही उधेड़ी सिस्टम की बखिया

by on | 2026-01-22 22:21:47

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अन्नदाता परेशान, सिस्टम मेहरबान! लक्ष्य बढ़ा पर तौल का 'पेंच' बरकरार, पूर्व विधायक ने केंद्र पर ही उधेड़ी सिस्टम की बखिया

घोरावल (सोनभद्र)। सरकारी फाइलों में लक्ष्य बढ़ाना और जमीन पर किसान का धान तुल जाना—इन दोनों के बीच की दूरी कितनी बड़ी है, यह घोरावल मंडी में देखने को मिली। धान खरीद में हो रही लेटलतीफी और लापरवाही पर पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे का पारा चढ़ गया। उन्होंने क्रय केंद्र पर पहुँचकर न केवल किसानों का दर्द सुना, बल्कि केंद्र प्रभारी को भी जमकर आड़े हाथों लिया।

पोर्टल खुला पर नसीब नहीं खुला!

​बता दें कि सोनभद्र में 10.80 लाख कुंतल का पुराना लक्ष्य पूरा होते ही पोर्टल बंद हो गया था, जिससे किसानों के ट्रैक्टरों के पहिए केंद्रों पर ही थम गए थे। भारी आक्रोश के बाद शासन ने 1.70 लाख कुंतल का अतिरिक्त लक्ष्य तो बढ़ा दिया, लेकिन घोरावल मंडी की तस्वीर अब भी वही ढाक के तीन पात वाली है। लालता, रामधनी और सुखनंदन जैसे तमाम किसान ट्रैक्टर ट्राली लेकर खड़े हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं।

25 हजार किसान, 11 हजार की खरीद: क्या यही है व्यवस्था?

​क्षेत्रीय विपणन अधिकारी दीपक वशिष्ठ के आंकड़े खुद ही सिस्टम की पोल खोल रहे हैं। तहसील में 25,000 किसानों ने पंजीकरण कराया, लेकिन अब तक सिर्फ 11,000 किसानों का ही धान खरीदा जा सका है। यानी आधी से ज्यादा आबादी अभी भी 'टोकन' और 'तारीख' के चक्कर में फंसी है। अधिकारी का तर्क है कि पैदावार के मुकाबले लक्ष्य कम है, लेकिन सवाल यह है कि किसान अपनी मेहनत की फसल आखिर लेकर कहाँ जाए?

पूर्व विधायक का अल्टीमेटम: "हर दाने की हो तौल"

​किसानों की सिसकी सुनकर मंडी पहुंचे पूर्व विधायक रमेश चंद्र दुबे ने केंद्र प्रभारी पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने दो टूक कहा कि जब पोर्टल खुल गया है और लक्ष्य बढ़ गया है, तो फिर किसानों को टरकाया क्यों जा रहा है? उन्होंने मांग की कि कतार में खड़े हर किसान का धान बिना किसी भेदभाव के फौरन तौला जाए।

अधिकारी की सफाई: टोकन का खेल जारी

​विपणन अधिकारी का कहना है कि एक केंद्र पर प्रतिदिन 200 कुंतल की लिमिट है और टोकन नंबर के आधार पर काम हो रहा है। लेकिन किसानों का आरोप है कि टोकन व्यवस्था की आड़ में बंदरबांट हो रही है और आम किसान कड़ाके की ठंड में अपनी फसल बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।



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