by on | 2026-01-21 23:23:32
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बक्सर: बिहार में सुशासन की सरकार भू-माफियाओं पर कार्रवाई का ढोल पीट रही है, लेकिन बक्सर की जमीन पर जो खेल चल रहा है, उसने सरकारी दावों की हवा निकाल दी है। कथित 'भू-माफिया' और वैष्णवी ग्रुप के चेयरमैन प्रदीप राय पर दो बेसहारा ब्राह्मण परिवारों की पुश्तैनी जमीन हड़पने का ऐसा आरोप लगा है, जिसने पूरे जिले को हिलाकर रख दिया है।
सोशल मीडिया पर जहां लोग प्रदीप राय को जेल भेजने की मांग कर रहे हैं, वहीं पीड़ित परिवारों का आरोप है कि कोर्ट के फैसले के बावजूद प्रशासन इस बाहुबली के रसूख के आगे घुटने टेके खड़ा है।
सियासी चश्मे के पीछे छिपने की कोशिश?
डुमरांव के पूर्व विधायक डॉ. अजीत कुमार सिंह ने जब इस मामले को मीडिया के सामने लाया, तो हड़कंप मच गया। चारों तरफ से घिरने के बाद प्रदीप राय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और इसे 'राजनीतिक द्वेष' का नाम दे दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर अपराध को 'राजनीति' का चोला ओढ़ाकर छिपाया जा सकता है?
पीड़ितों की चीख: "कोर्ट ने हमें हक दिया, बाहुबल ने हमसे छीना"
वैष्णवी ग्रुप के चेयरमैन भले ही कागजों का हवाला दे रहे हों, लेकिन पीड़ित परिवारों का दावा उनके दावों की धज्जियां उड़ा रहा है। पीड़ितों का कहना है:
सिविल कोर्ट का फैसला: पीड़ितों के मुताबिक, सिविल कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया है, लेकिन प्रदीप राय अपने धनबल और रसूख के दम पर उस फैसले को जमीन पर लागू नहीं होने दे रहे हैं।
फर्जीवाड़े का खेल: आरोप है कि जिस 'पावर ऑफ अटॉर्नी' और 'कबाला' की बात चेयरमैन साहब कर रहे हैं, उसकी बुनियाद ही फर्जीवाड़े पर टिकी है। हस्ताक्षरों और अंगूठे के निशान को लेकर गहरा संशय है।
अधिकारी मौन क्यों?: जब कोर्ट का आदेश पीड़ितों के हक में है, तो आखिर प्रशासन प्रदीप राय पर हाथ डालने से क्यों कतरा रहा है? क्या बक्सर में कानून से ऊपर रसूख हो गया है?
चेयरमैन की सफाई या जांच से बचने का पैंतरा?
प्रदीप राय ने टीएस संख्या 390/2021 और अन्य अदालती मामलों का हवाला देते हुए खुद को पाक-साफ बताया है। उन्होंने 'फॉरेंसिक जांच' की चुनौती भी दी है। लेकिन जनता पूछ रही है—अगर सब कुछ इतना ही पारदर्शी है, तो दो परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर क्यों हैं? पूर्व विधायक डॉ. अजीत सिंह ने साफ कहा कि यह सीधे तौर पर गरीब ब्राह्मण परिवारों को उनके हक से वंचित करने का मामला है।
बेबाक टिप्पणी: > किसी भी मामले में जब 'पावर ऑफ अटॉर्नी' और 'जमीन के बैनामे' पर सवाल उठते हैं, तो वह धुआं बिना आग के नहीं उठता। अगर प्रदीप राय दोषी नहीं हैं, तो उन्हें उच्च स्तरीय जांच से परहेज क्यों? और अगर पीड़ितों के पास कोर्ट का आदेश है, तो प्रशासन उन्हें कब्जा दिलाने में नाकाम क्यों है?
अगला कदम: न्याय या रसूख की जीत?
बक्सर की जनता अब आर-पार के मूड में है। सोशल मीडिया पर 'ट्रेंड' हो रहा है कि अगर मामला सही है, तो ऐसे लोगों की जगह आलीशान बंगलों में नहीं, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे होनी चाहिए।
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