by on | 2026-04-18 10:50:19
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लखनऊ | राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’—एक ऐसा नाम जिसके शब्द आज भी रगों में लहू बनकर दौड़ते हैं। उनकी कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ के 75वें वर्ष (हीरक जयंती) और कवि की पावन पुण्यतिथि के अवसर पर राजधानी लखनऊ एक ऐतिहासिक आयोजन का गवाह बनने जा रही है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास द्वारा आगामी 24 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026 तक इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में त्रिदिवसीय ‘रश्मिरथी पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। इस भव्य आयोजन को लेकर आज शासकीय आवास पर एक महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय बैठक संपन्न हुई, जिसमें कार्यक्रम की रूपरेखा और तैयारियों को अंतिम रूप दिया गया।
बैठक में बनी 'रणनीति', जुटे दिग्गज
आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमित दीक्षित (राम जी) और नीरज सिंह ने इस बैठक की कमान संभाली। बैठक में संदीप शाही के साथ-साथ अखिल भारतीय भोजपुरी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रभुनाथ राय की गरिमामयी उपस्थिति रही।
साथ ही, सत्येंद्र सिंह, सरवन राय और अभय सिंह जैसे प्रमुख चेहरों ने भी कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अपने सुझाव साझा किए। चर्चा का मुख्य केंद्र यह रहा कि कैसे रामधारी सिंह दिनकर के विचारों और 'रश्मिरथी' के ओज को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया जाए।
काव्य पंक्तियों में झलकता 'रश्मिरथी पर्व' का सार
यह आयोजन केवल एक स्मृति सभा नहीं है, बल्कि उस संकल्प की पुनरावृत्ति है जो दिनकर ने वर्षों पहले लिखी थी:
"पीसा जाता जब इक्षु-दंड, झरती रस की धारा अखंड,
मेंहदी जब सहती है प्रहार, बनती ललनाओं का श्रृंगार।"
जिस तरह तपकर ही व्यक्तित्व निखरता है, उसी तरह 'रश्मिरथी पर्व' के माध्यम से समाज में संघर्ष और पुरुषार्थ की भावना जगाने का प्रयास किया जाएगा। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि आज के दौर में जब समाज को नैतिक बल की आवश्यकता है, तब कर्ण के चरित्र के माध्यम से त्याग और शौर्य का संदेश प्रसारित करना अनिवार्य है।
जैसा कि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था:
"तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के,
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के।"
इसी भाव के साथ, यह तीन दिवसीय पर्व जाति और वर्ग से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों और राष्ट्रवाद को समर्पित होगा।
आयोजन का मुख्य आकर्षण
साहित्यिक संगम: देशभर के प्रखर विद्वानों द्वारा 'रश्मिरथी' के विभिन्न आयामों पर विमर्श।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ: दिनकर की कविताओं का ओजपूर्ण पाठ और उन पर आधारित नाट्य मंचन।
युवा भागीदारी: नई पीढ़ी को दिनकर के 'अनल-किरीट' (आग के मुकुट) वाले साहित्य से जोड़ना।
निष्कर्ष: विवेक जगाने की तैयारी
"जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है..."
दिनकर की ये पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। लखनऊ की धरती पर होने वाला यह 'रश्मिरथी पर्व' हिंदी साहित्य के उस 'सूर्य' को सच्ची श्रद्धांजलि है, जिसने अपनी कलम से सोए हुए राष्ट्र को जगाने का काम किया था। न्यास की इस बैठक ने यह साफ कर दिया है कि 24 अप्रैल से लखनऊ की फिजाओं में सिर्फ और सिर्फ वीर रस की गूँज होगी।
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