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सरेराह कत्लेआम: जब 'बाघ और बकरियों' ने मिलकर लिखी थी सुनील राय की मौत की पटकथा!

by on | 2026-04-06 11:33:44

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सरेराह कत्लेआम: जब 'बाघ और बकरियों' ने मिलकर लिखी थी सुनील राय की मौत की पटकथा!

वाराणसी: राजनीति जब रंजिश की कोख से जन्म लेती है, तो परिणाम 'नरिया कांड' जैसा भयावह होता है। 6 अप्रैल 1997 की वो शाम बनारस कभी नहीं भूल सकता, जब छात्र राजनीति के दो चमकते सितारों को एके-47 की गोलियों से छलनी कर दिया गया। यह सिर्फ एक गैंगवार नहीं था, यह बनारस के उस 'अजेय' जनबल को कुचलने की साजिश थी, जिसके सामने विरोधियों की घिघी बंध जाती थी।

वारदात: नरिया तिराहा, एके-47 और वो खूनी 'डेथ मिशन'

​बीएचयू अस्पताल में भर्ती सपा विधायक सत्य प्रकाश सोनकर का हाल जानकर लौट रहे काफिले को क्या पता था कि मौत 'नरिया' के मोड़ पर घात लगाए बैठी है। कुख्यात शूटर मुन्ना बजरंगी ने अपनी एके-47 का मुंह खोल दिया।

  • निशाने पर कौन? छात्र राजनीति के युवा तुर्क सुनील राय, नवनिर्वाचित अध्यक्ष रामप्रकाश पांडेय 'बाबा', राजू त्रिवेदी और भोनू मल्लाह
  • मंजर: चंद सेकंड और सैकड़ों राउंड फायरिंग। बनारस की सड़क खून से लाल हो गई। रामप्रकाश पांडेय तो इतने बदकिस्मत रहे कि जीत के बाद उन्हें अध्यक्ष पद की शपथ तक नसीब नहीं हुई।
  • "सत्ता के गलियारों में चर्चा थी कि सुनील राय को गिराने के लिए उस रात 'बाघ और बकरियों' (पुराने दुश्मनों और नए प्रतिद्वंदियों) ने एक ही घाट पर पानी पिया था।"


    सुनील राय: 'पक्ष का वो पहाड़' जिसे हिलाना नामुमकिन था

    ​सुनील राय महज एक नेता नहीं, एक अद्भुत नेतृत्व क्षमता का नाम था। उनका जनबल ऐसा था कि जिधर खड़े हो जाते, सियासत का रुख उधर ही मुड़ जाता। स्पष्टवादिता उनकी पहचान थी और यही बेबाकी उनके दुश्मनों की आंखों की किरकिरी बन गई।

    दहल उठा बनारस: कैंट से लहुराबीर तक सिर्फ 'तांडव'

    ​जैसे ही सुनील राय और रामप्रकाश पांडेय की हत्या की खबर फैली, बनारस 'ज्वालामुखी' बन गया।

    • कैंट से लहुराबीर तक: दुकानें धू-धू कर जल उठीं।
    • सड़कों पर गुस्सा: छात्र और समर्थक न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए। पुलिस प्रशासन लाचार नजर आ रहा था और पूरा शहर भारी तनाव की चादर में लिपटा था।

    विद्यापीठ का सबक: जब जून में बदला इतिहास

    ​इस नरसंहार ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ प्रशासन की आंखें खोल दीं। जून 1997 में जब दोबारा चुनाव हुए, तो नजारा बदला हुआ था:

    1. नंदू सिंह की जीत: भारी मतों से डॉ. नंदू सिंह अध्यक्ष चुने गए।
    2. ABVP का उदय: इसी चुनाव ने विद्यापीठ कैंपस में एबीवीपी (ABVP) का खाता खोलकर नई राजनीतिक इबारत लिखी।
    3. स्पॉट शपथ ग्रहण: प्रशासन ने पिछली बार की तरह 'वेट' नहीं किया। परिणाम आते ही डॉ. नंदू सिंह को तुरंत शपथ दिलाई गई ताकि कोई और 'शपथ से पहले मौत' का शिकार न हो सके।

    बेबाक 24 की राय: नरिया कांड आज भी गवाही देता है कि जब अपराधी, सियासत के मोहरे बनते हैं, तो सुनील राय जैसे कद्दावर और रामप्रकाश पांडेय जैसे उभरते नेतृत्व की बलि चढ़ जाती है। आज भी काशी विद्यापीठ की फिजाओं में इन शहीदों की यादें तैरती हैं, लेकिन सवाल वही है—क्या अपराध मुक्त छात्र राजनीति कभी मुमकिन है?



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