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आस्था का बाजारीकरण या पुण्य का सौदा?

by on | 2026-03-29 09:14:36

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आस्था का बाजारीकरण या पुण्य का सौदा?


​वाराणसी: काशी की धरती पर आज एक ऐसी घोषणा हुई जिसने श्रद्धा और सवाल, दोनों को एक साथ खड़ा कर दिया है। जिला प्रशासन और IMA ने रविवार को काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में रक्तदान शिविर लगाया है। शर्त यह कि 'खून दो और बाबा का स्पर्श दर्शन पाओ।'
​एक तरफ इसे "सराहनीय पहल" बताया जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ काशी के गलियों में दबी जुबान से एक टीस उभर रही है—क्या महादेव के स्पर्श के लिए अब रक्त का "सौदा" होगा?
​इतिहास के पन्नों से टकराती कड़वी हकीकत
​इतिहास गवाह है कि इसी मिट्टी के पूर्वजों ने कभी 'जजिया कर' न चुका पाने के एवज में अपना खून दिया था, ताकि अपनी संस्कृति और मंदिर को बचा सकें। वह मजबूरी का दौर था, जुल्म का काल था। लेकिन आज, जब हम आजाद हैं और महादेव सबके हैं, तब बाबा के गर्भगृह में प्रवेश और उनके स्पर्श को एक 'इनाम' (Reward) की तरह पेश करना क्या हमारी नियति बन गई है?
​बेबाक सवाल: जिम्मेदार कौन?
​क्या हम काशी वासी इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि बिना किसी "लालच" या "प्रलोभन" के रक्तदान जैसी मानवीय सेवा के लिए आगे नहीं आ सकते? या फिर प्रशासन ने यह मान लिया है कि आस्था अब केवल 'लेन-देन' की भाषा समझती है?
​व्यवस्था पर चोट: अगर स्पर्श दर्शन हर भक्त का अधिकार है, तो उसे 'कैश' या 'ब्लड' के बदले क्यों तौला जा रहा है?
​समाज का आईना: क्या हमारी नियति ही ऐसी है कि हमें अपने आराध्य तक पहुँचने के लिए हमेशा कुछ न कुछ "चुकाना" होगा? पहले कर, फिर वीआईपी टिकट, और अब सेवा के नाम पर शर्त?
​बेबाक राय: रक्तदान महादान है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन जब आप किसी निस्वार्थ सेवा को किसी 'दुर्लभ सुविधा' से जोड़ देते हैं, तो सेवा का मूल्य बढ़ता नहीं, बल्कि श्रद्धा का स्तर गिर जाता है। बाबा विश्वनाथ किसी वीआईपी या रक्तदाता के नहीं, वो तो 'अघोरी' और 'अकिंचन' के भी उतने ही हैं।



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