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बड़ी खबर: 22 साल बाद 'डॉन' के वार पर 'बाहुबली' की जीत, मुख्तार की रूह को लगा कानूनी झटका!

by on | 2026-03-28 23:32:38

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बड़ी खबर: 22 साल बाद 'डॉन' के वार पर 'बाहुबली' की जीत, मुख्तार की रूह को लगा कानूनी झटका!


लखनऊ | पूर्वांचल के सियासी और माफिया गलियारों से आज की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। लखनऊ की एमपी-एमएलए कोर्ट ने राजधानी के चर्चित कैंट गोलीकांड (2004) में पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह को 'बाइज्जत' बरी कर दिया है। 22 साल तक चली इस कानूनी नूरा-कुश्ती का अंत शनिवार को तब हुआ, जब कोर्ट ने साक्ष्यों की कंगाली देखते हुए बृजेश समेत सभी पांचों आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।

सदर क्रॉसिंग का वो 'खूनी' सन्नाटा: क्या था मामला?

बात 13 जनवरी 2004 की है, जब लखनऊ की सदर रेलवे क्रॉसिंग गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठी थी। आरोप था कि मुख्तार अंसारी और भाजपा नेता कृष्णानंद राय के काफिले आमने-सामने आ गए थे। वर्चस्व की इस जंग में दोनों तरफ से अंधाधुंध फायरिंग हुई। पुलिस ने इसे हत्या के प्रयास और गैंगेस्टर एक्ट के तहत दर्ज किया था, जिसमें बृजेश सिंह को मुख्य सूत्रधार बताया गया था।

इन ' के सिर से हटा कलंक

अदालत ने केवल बृजेश सिंह ही नहीं, बल्कि उनके पूरे खेमे को क्लीन चिट दे दी है। बरी होने वालों में शामिल हैं:

 * बृजेश सिंह (मुख्य आरोपी/पूर्व एमएलसी)

 * त्रिभुवन सिंह (बृजेश के बेहद करीबी)

 * सुनील राय

 * आनंद राय

 * अजय सिंह उर्फ गुड्डू

बेबाक विश्लेषण: क्यों और कैसे ढह गया अभियोजन का किला?

सूत्रों की मानें तो यह केस कानून की किताबों में नहीं, बल्कि गवाहों की 'सेटिंग' में हार गया। इस फैसले के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि मुख्तार का शेटर अब पाला बदल चुका है। > पर्दे के पीछे का सच: > चर्चा है कि अफरोज खां, चून्नू पहलवान और उनके परिवार को छोड़कर लगभग सभी अहम गवाहों ने सभी मामलों मे अपनी जुबान पर ताला जड़ लिया है या फिर अपनी पहचान और बयान से मुकर गए।

पक्षद्रोही (Hostile) गवाहों की भूमिका:

ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष उस समय असहाय हो गया जब एक-एक कर गवाहों ने अदालत में बृजेश सिंह को पहचानने से इनकार कर दिया। कृष्णानंद राय और मुख्तार अंसारी—दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, जिससे पैरवी की धार पहले ही कुंद हो चुकी थी। सपा और बसपा के दौर में जिस रसूख के दम पर मुकदमे लिखे गए थे, सत्ता बदलते ही उन कागजों की स्याही फीकी पड़ गई।

पूर्वांचल का वो 'खूनी' इतिहास

यह केवल एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि उस खूनी रंजिश का एक अध्याय है जिसने पूर्वांचल में सैकड़ों मांओं की गोद सूनी की। विशेषकर मोहम्मदाबाद क्षेत्र में भूमिहारों को इस गैंगवार की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। 1985 से शुरू हुआ बृजेश सिंह का आपराधिक सफर अब सफेदपोश राजनीति और कानूनी राहतों के नए पड़ाव पर है।

हमारा नजरिया:

क्या यह न्याय की जीत है या साक्ष्यों को 'मैनेज' करने की कला? जब गवाह मुकर जाते हैं और जांच एजेंसियां ढीली पड़ जाती हैं, तो 22 साल बाद मिलने वाली ऐसी 'राहत' व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है।




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