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बस्तर का 'भीष्म पितामह' सरेंडर: क्या नक्सलवाद का 'अंतिम अध्याय' लिखा जा चुका है?

by on | 2026-03-25 01:28:32

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बस्तर का 'भीष्म पितामह' सरेंडर: क्या नक्सलवाद का 'अंतिम अध्याय' लिखा जा चुका है?

रायपुर/जगदलपुर: जिस नाम की दहशत से बस्तर के अबूझमाड़ की हवाएं भी डरती थीं, आज उस नाम ने छत्तीसगढ़ पुलिस के सामने सिर झुका दिया है। देवेन्द्र उर्फ पापराव—ये सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि माओवादी मिलिट्री ऑपरेशन की वो 'यूनिवर्सिटी' था जिसने तीन दशकों तक खूनी खेल की स्क्रिप्ट लिखी।

पापराव: आतंक का वो चेहरा जिसका कद 'म्युटेंट' जैसा था

​पापराव कोई मामूली कैडर नहीं था। वह नक्सलियों की सबसे खतरनाक इकाई सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (CMC) का अहम हिस्सा और बस्तर की डिवीजनल कमेटी का मुखिया रहा है।

  • 80 से ज्यादा बड़े हमले: ताड़मेटला से लेकर झीरम घाटी तक, हर बड़ी साजिश के तार कहीं न कहीं इस मास्टरमाइंड से जुड़े होने का संदेह रहा है।
  • 25 लाख से 1 करोड़ का इनाम: अलग-अलग राज्यों (छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओडिशा) ने इस पर इतना इनाम रखा था कि उतने में एक गांव का कायाकल्प हो जाए।
  • गुरिल्ला वॉर का उस्ताद: कहते हैं कि उसे जंगल के चप्पे-चप्पे की ऐसी जानकारी थी कि सैटेलाइट भी फेल हो जाए।

क्यों हिला नक्सली साम्राज्य? (अंदर की बात)

​पापराव का जाना नक्सलवाद के ताबूत में आखिरी कील माना जा रहा है। इसके पीछे के तीन बेबाक कारण समझिए:

  1. नेतृत्व का अकाल: गणपति और किश्दा जैसे पुराने लीडरों के हटने के बाद पापराव ही वह कड़ी था जो नए लड़कों को 'लाल सलाम' के सपने बेचता था। अब दुकान बढ़ चुकी है।
  2. ऑपरेशन 'कगार' का खौफ: सुरक्षाबलों ने जिस तरह से माड़ के अंदर घुसकर सर्जिकल प्रहार किए हैं, उससे पापराव को समझ आ गया था कि अब 'शहादत' नहीं, सिर्फ 'सफाई' होनी बाकी है।
  3. सिस्टम का जाल: मुखबिरों का बढ़ता नेटवर्क और ड्रोन की निगरानी ने इसे गुफाओं में छिपने पर मजबूर कर दिया था।

बेबाक 24 का बड़ा सवाल: 'सफेदपोश मददगारों' की लिस्ट कब आएगी?

​खबरों के पीछे की खबर ये है कि पापराव सिर्फ बंदूक चलाना नहीं जानता था, उसे नक्सल फंडिंग की नस-नस का पता है।

"पापराव ने सरेंडर किया है या कोई डील हुई है? क्योंकि असली खेल तो उन शहरों में बैठे 'शहरी नक्सलियों' और 'ठेकेदारों' का है जो जंगलों की आग पर अपनी रोटियां सेंकते हैं।"


​अगर पुलिस ने सही ढंग से उगलवा लिया, तो रायपुर से लेकर दिल्ली तक बैठे कई सफेदपोशों की रात की नींद हराम होने वाली है।

निष्कर्ष: अंत की शुरुआत?

​बस्तर के आईजी और डीजीपी की मुस्कुराहट बता रही है कि यह सिर्फ एक गिरफ्तारी नहीं, एक प्रोपेगेंडा की हार है। पापराव का सरेंडर संदेश है उन युवाओं को जो गुमराह होकर हाथ में बंदूक थामे हुए हैं—कि जब तुम्हारा 'सुल्तान' ही सुरक्षित नहीं, तो तुम किस खेत की मूली हो?



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