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काशी से हुंकार: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने फूँका 'चतुरंगिणी सेना' का शंखनाद! गौ, धर्म और ब्राह्मण की रक्षा के लिए सजेगी बिसात

by on | 2026-03-23 14:32:13

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काशी से हुंकार: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने फूँका 'चतुरंगिणी सेना' का शंखनाद! गौ, धर्म और ब्राह्मण की रक्षा के लिए सजेगी बिसात

वाराणसी | ​धर्म की नगरी काशी से एक ऐसी खबर आ रही है जो सनातन जगत में हलचल मचाने के लिए काफी है। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘चतुरंगिणी सेना’ के गठन का ऐलान कर दिया है। इसे केवल एक संगठन नहीं, बल्कि गौ, धर्म और ब्राह्मण की रक्षा के लिए एक अभेद्य दुर्ग के रूप में देखा जा रहा है।
​लेकिन क्या यह सेना पारंपरिक युद्ध लड़ेगी? या इसकी रणनीति कुछ और है? आइए, इस बड़ी घोषणा की परतों को बेबाकी से खोलते हैं।
​कैसी होगी सेना की बनावट? (पदों का चक्रव्यूह)
​स्वामी जी ने इस सेना को एक व्यवस्थित सैन्य ढांचे की तरह डिजाइन किया है। इसमें प्राचीन ग्रंथों की तरह पदों का वर्गीकरण किया गया है। सेना की कमान इन पदों के हाथ में होगी:
​शीर्ष नेतृत्व: महासेनापति
​क्षेत्रीय कमान: अनीकिनीपति, चमुपति, पृतनापति और वाहिनीपति
​जमीनी मोर्चा: गणपाल, गुल्मपति, सेनामुखपति और पतिपाल
​शक्ति के चार स्तंभ: मन, तन, धन और जन
​यह सेना लाठी-डंडों से ज्यादा 'बल' पर केंद्रित है। इसके संचालन के लिए चार अंगाध्यक्ष नियुक्त किए जाएंगे, जो समाज की चार मुख्य शक्तियों को नियंत्रित करेंगे:
​मनबल: मानसिक दृढ़ता और आध्यात्मिक चेतना।
​तनबल: शारीरिक स्वास्थ्य और रक्षण क्षमता।
​धनबल: आर्थिक स्वावलंबन और संसाधनों की व्यवस्था।
​जनबल: सामाजिक एकजुटता और भारी जनसमर्थन।
​बेबाक की तीखी नज़र: क्या है असली मकसद?
​स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह कदम सीधे तौर पर हिंदू समाज के भीतर के 'भय' को खत्म करने की एक बड़ी कोशिश है। इस पहल के पीछे मुख्य उद्देश्य हैं:
​अंतिम पायदान की सुरक्षा: समाज के उस व्यक्ति तक पहुँचना जो खुद को अकेला महसूस करता है।
​अन्याय के खिलाफ आवाज: सनातनियों को अन्याय सहने के बजाय उसके विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देना।
​सांस्कृतिक पुनरुत्थान: आधुनिकता की दौड़ में पीछे छूट रहे पारंपरिक मूल्यों को वापस मुख्यधारा में लाना।
​बेबाक टिप्पणी: स्वामी जी ने साफ कर दिया है कि यह सेना अहिंसक होगी। इसका काम दंगा-फसाद करना नहीं, बल्कि जागरूकता फैलाना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संगठित ढांचा केवल कागजों तक सीमित रहेगा या जमीन पर कोई ठोस बदलाव ला पाएगा?
​धर्मप्रेमियों से आह्वान
​स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि एकजुटता ही सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने अपील की है कि जो लोग सनातन मूल्यों के प्रति समर्पित हैं, वे इस 'चतुरंगिणी सेना' का हिस्सा बनें और समाज में सकारात्मक बदलाव के संवाहक बनें।



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